Aug. 19, 2021

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         दमिरिका

कृष्णा एवं तुंगभद्रा नदी के दक्षिण में स्थित क्षेत्र को तमिलहम् या द्रविड़ देश कहा जाता है। पेरिप्लस ऑफ़ द इरिथ्रियन-सी में इसी क्षेत्र को दमिरिका (दमिलकम) कहा गया है। सर्वप्रथम ऐतरेय ब्राह्मण में आंध्र, पुण्ड्र, शबर, पुलिन्द आदि का जातियों के रूप में वर्णन है। यही आंध्र, पुण्ड्र (बंगाल) आदि आगे चलकर एक प्रदेश के रूप में जाने गए।

संभावित प्रश्न 

Q. प्राचीन भारतीय इतिहास में ‘दमिरिका’ शब्द किससे संबंधित है?

(a) मध्य प्रदेश (b) उत्तरापथ

(c) प्रातीच्य (d) द्रविड़ देश

उत्तर: (d)

 

अकम एवं पुरम

अकम एवं पुरम संगम साहित्य की दो काव्य श्रेणियाँ हैं। ‘पुरम’को जनकाव्य की संज्ञा दी जाती है, जिनका विषय युद्ध है, जबकि ‘अकम’काव्यों का विषय ‘प्रेम’ है। इन पद्य संग्रहों में 473 कवियों और 30 महिला कवयत्रियों की कुल 2381 रचनाएँ हैं। अकम काव्यों में विविध भावों की अभिव्यक्ति हेतु ऐसी उपमाओं का प्रयोग किया गया है, जो किसी न किसी भौगोलिक संरचना से संबद्ध हैं। इन्हें ‘तिनाई’ कहा गया है। इसमें प्रत्येक का नामकरण किसी ‘फ़ूल’ पर किया गया है।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: प्राचीन भारतीय इतिहास में ‘अकम’एवं ‘पुरम’का संबंध किससे है?

(a) संगम साहित्य काव्य की दो श्रेणियाँ

 (b) संगम कालीन दो नगर

(c) भू-माप की पद्धतियाँ

(d) भू-राजस्व वसूली की पद्धतियाँ

उत्तर: (a)

 

कोश्य प्रवेश्य

मौर्य काल के अंतर्गत टकसालों में तैयार मुद्राओं को ‘कोश्य प्रवेश्य’ कहा गया है। वस्तुतः मौर्य काल में ही पहली बार मुद्रा निर्माण के कार्य को राजकीय कार्य के अंतर्गत स्वीकार किया गया। सर्वप्रथम कौटिल्य ने ही ‘टकसाल’या ‘टंकशाला’शब्द का प्रयोग किया था। उन्होंने मुद्रा पर चिन्ह अंकित करने वाले मुख्य उपकरण बिम्बटंक का उल्लेख किया है। मौर्यकाल तक सिक्कों के निर्माण में साँचों का प्रयोग नहीं होता था। अर्थशास्त्र में ‘कूटरूपक’का उल्लेख मिलता है, जो जाली (कूट) मुद्राओं का निर्माण करते थे।

 

संभावित प्रश्न  

Q. प्राचीन भारतीय इतिहास के दौरान मौर्य काल में ‘कोश्य प्रवेश्य’पद किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?

(a) भू-राजस्व में वृद्धि के लिए  

(b) बाह्य व्यापारियों के लिए

(c) राजस्व विभाग के अधिकारी के लिए  

(d) टकसालों में तैयार मुद्राओं के लिए

उत्तर: (d)

 

शाकम्भरी

हड़प्पा से प्राप्त एक मुहर में सिर के बल खड़ी एक स्त्री का चित्र अंकित है। इसी स्त्री के गर्भ से पौधे को निकलते दिखाया गया है। इसे जॉन मार्शल ने पृथ्वी माता का आद्य रूप या शाकम्भरी कहा है। हड़प्पाई लोग धरती को उर्वरता की देवी समझते थे। इसी मुहर के दूसरी ओर एक पुरूष शस्त्र लिए खड़ा है तथा हाथ उठाए एक स्त्री खड़ी है। इससे अनुमान लगाया गया कि मातृदेवी की पूजा में बलि दी जाती थी।

 

संभावित प्रश्न  

Q.- प्राचीन भारतीय इतिहास में ‘शाकम्भरी’ शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?

(a) ऋग्वैदिक कालीन कृषि भूमि के देवता

(b) हड़प्पाई सभ्यता में उर्वरता की देवी

(c) वैदिक कालीन उपासना पद्धति  

(d) एक प्रकार की यज्ञ वेदी

उत्तर: (b)

 

धर्मगंज

‘धर्मगंज’ नालन्दा में स्थित एक विशाल पुस्तकालय था। यह भारत का प्राचीनतम पुस्तकालय था। रत्नोदधि, रत्नसागर एवं रत्नरंधक इसी पुस्तकालय के भाग थे। वस्तुतः नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना कुमारगुप्त (शक्रादित्य) ने की थी। यह राजगृह के आधुनिक बड़गाँव में अवस्थित है। हर्षवर्द्धन ने इसके चारों तरफ़ चहारदीवारी बनवाकर यहाँ पर ताम्र विहार बनवाया था। ह्वेनसांग के समय नालंदा विश्वविद्यालय का कुलपति शीलभद्र था। 12वीं शताब्दी ने बख्तियार खिलजी ने इसे नष्ट कर दिया था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.- प्राचीन भारतीय इतिहास में ‘धर्मगंज’क्या था/थी-

(a) नालंदा का विशाल पुस्तकालय

(b) ब्राह्मणों को प्रदत्त भूमि अनुदान

(c) वैदिक कालीन यज्ञ की पद्धति

(d) सिंधु सभ्यता का पुरोहित

उत्तर: (a)

 

मधूच्छिष्ट

पाषाण के अतिरिक्त सिंधु सभ्यता के शिल्पकारों ने धातुओं से भी सुंदर मूर्तियों का निर्माण किया। इनका निर्माण मधूच्छिष्ट विधि (Lost Wax) से हुआ है। इसके अंतर्गत धातु को मोम जैसा पिघलाकर साँचे में ढाल देना ही Cire Perdue या मधूच्छिष्ट विधि है। इसे द्रवी मोम विधि भी कहते हैं। धातु में मुख्यतः काँसे की मूर्तियाँ बनती थीं। मोहनजोदड़ो, चन्हूदड़ो, लोथल, कालीबंगा तथा दैमाबाद से काँसे की मूर्तियाँ मिली हैं। मोहनजोदड़ो से ताँबे की दो मानव मूर्तियाँ मिली हैं। पहली कमर पर हाथ रखे हुए तथा दूसरी हाथ ऊपर उठाए हुए है।  

 

संभावित प्रश्न  

Q.- प्राचीन भारतीय सांस्कृतिक इतिहास में ‘मधूच्छिष्ट विधि’ का संबंध किससे है?

(a) वस्त्र निर्माण से   (b) शहद के उत्पादन से

(c) धातु मूर्ति के निर्माण से  (d) यज्ञ - अनुष्ठान से

उत्तर: (c)

 

डालमेन

महापाषाण काल में डालमेन समाधियों का एक प्रकार था। इस प्रकार के महापाषाण से जुड़े कब्र जमीन से ऊपर बने होते हैं। डालमेन का अर्थ पत्थर की मेज (Stone Table)  होता है। यह आयताकार मेज के आकार की होती है। इसमें शव-मंजूषाएं (ताबूत) भी मिलते हैं। ब्रह्मगिरी एवं चिंगलपेट से इनके उदाहरण मिलते हैं। ब्रह्मगिरी से गवाक्षयुक्त डालमेन समाधि मिली है।

 

संभावित प्रश्न  

Q.- प्राचीन भारतीय इतिहास में ‘डालमेन’ क्या/कौन था?

(a) हड़प्पाकालीन बंदरगाह  (b) महापाषाणयुगीन समाधि

(c) सिंधु सभ्यता की मुहर           (d) एक यूनानी राजदूत

उत्तर: (b)

 

पावमान्या

ऋग्वेद के नौवें मंडल के ऋषियों को ‘पावमान्या’ कहा जाता था। यह मंडल अंगिरा ऋषि से संबंधित है। इसमें कुल 114 सूक्त हैं, जो सोम देवता को समर्पित हैं। अधिकांशतः एफ़ेड्रा नामक पौधें से सोम की पहचान की जाती है। सोम को ही पवमान कहते हैं। सोम देवता को समर्पित होने के कारण इसे पवमान मण्डल भी कहा जाता है। ब्राह्मण अपना देवता ‘सोम’ को मानता था। यह हिमालय की मूजवंत या मूजवान चोटी पर उगता था। अथर्ववेद में मूजवंत का उल्लेख एक जाति के रूप में भी किया गया है।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: प्राचीन वैदिक इतिहास ‘पावमान्या’शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?

(a) ऋग्वैदिक प्रशासनिक अधिकारी  

(b) ऋग्वेद के नौवें मंडल के ऋषि

(c) राजा के व्यक्तिगत कर्मचारी

 (d) गायों का निवास स्थल

उत्तर: (b)

 

विशमत्ता/आद्य/यथाकामवध्य/कृपण

ऋग्वेद के ऐतरेय ब्राह्मण ग्रंथ में राजा को विशमत्ता (अर्थात् वैश्य का भक्षण करने वाला) कहा गया है। इसके अलावा, राजा को धर्मस्यगोप्ता भी कहा जाता था। इसी क्रम में ऐतरेय ब्राह्मण में ‘आद्य’ शब्द वैश्य के लिए एवं ‘यथाकामवध्य’ शब्द शूद्र के लिए प्रयुक्त हुआ है। कन्या को कृपण अर्थात् दुःख देने वाली कहा गया है। ऐतरेय ब्राह्मण में चतुर्युग (सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग) की भी व्याख्या की गई है।

 

संभावित प्रश्न  

Q.- प्राचीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों को सुमेलित कीजिए-

   सूची-I                 सूची-II

A. विशमत्ता         1-  कन्या

B. आद्य                 2-   वैश्य

C. यथाकामवध्य 3-  राजा

D. कृपण         4-  शूद्र

   कूट:

 A B C D  

(a) 4 1 3 2

(b) 3 2 4 1

(c) 1 2 3 4  

(d) 4 1 2 3

उत्तर: (b)

 

किल्लवतस्पद

ऋग्वेद में ‘सभा’ नामक प्रशासनिक संस्था को किल्लवतस्पद या किल्विष स्पृत अर्थात् पाप का विमोचन करने वाली कहा गया है। अथर्ववेद में सभा को नरिष्ठा या रिष्ट (अजेया) एवं सप्त संसद कहा गया है। नरिष्ठा का अर्थ है जिसके निर्णय कोई टाल न सके। वस्तुतः सभा कुलीन वर्गों या कुल वृद्धों की संस्था थी जो राजा को निरंकुश नहीं होने देती थी तथा यह कुछ न्यायिक कार्य भी करती थी। पारस्कर गृह्यसूत्र  में सभा के लिए नादि और त्विषी अर्थात् शब्दावती और प्रकाशवती वर्णित है, जिसका तात्पर्य क्रमशः धार्मनिरूपण एवं दिव्य परीक्षाओं हेतु प्रयुक्त अग्नि से था। सभा का अध्यक्ष सभ्य तथा सदस्य सुजात कहलाते थे।

 

संभावित प्रश्न  

Q. वैदिक काल में ‘किल्लवतस्पद’ शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?

(a) सभा (b) विदथ (c) गुप्तचर  (d) रथकार

उत्तर: (a)

 

दुरोण/शैलुष/निष्क

दुरोण - प्रारंभिक वैदिक ग्रंथों में गृहस्थी के लिए ‘दुरोण’ शब्द का प्रयोग हुआ है। वस्तुतः गृहस्थी का तात्पर्य ऐसे सदस्यों से होता है, जो एक ही आवास में रहते हैं तथा विभिन्न आर्थिक गतिविधियों का निष्पादन करते हैं। ऋग्वैदिक काल में गृहस्थी के लिए क्षिति, दम, पस्त्य, गय तथा गृह जैसे अन्य शब्द भी प्रचलित थे।

शैलुष - यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता में नृत्य या अभिनय से संबंधित पात्र को ‘शैलुष’ कहा गया है।

निष्क - उत्तर वैदिक काल के लोगों द्वारा गले में पहने जाने वाले आभूषण को ‘निष्क’ कहा जाता था। इसके अलावा, अन्य आभूषण और विभिन्न प्रकार के शंखों का प्रयोग ताबीज के रूप में अनिष्ट को दूर रखने के लिए किया जाता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q. वैदिक कालीन इतिहास के संदर्भ में कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?

1- दुरोण - गृहस्थी  

2-  शैलुष - हल  

3-  निष्क – आभूषण

कूटः

(a) 1 और 3 (b) केवल 3

(c) 1 और 2  (d) 2 और 3  

उत्तर: (a)

 

करम्भ/यातुधान/पर्वरिक्ति

करम्भ: उत्तर वैदिक काल में अनाज, विशेषकर जौ, तिल एवं अन्य अनाजों से बनी खीर को ‘करम्भ’ कहा जाता था। इसके अलावा, जौ से ‘यवागु’ नामक लपसी या दलिया बनाया जाता था।

पर्वरिक्ति:  उत्तर वैदिक काल में ‘पर्वरिक्ति’ शब्द किसी अमंगल को दूर करने हेतु परित्यक्त रानी के लिए प्रयुक्त हुआ है।

यातुधान:   ऋग्वैदिक काल में यातुधान, जादू-टोने से संबद्ध ओझा को कहते थे। इसके अतिरिक्त ऋग्वेद राक्षस और पिशाचों के अस्तित्व के बारे में भी बताता है।

 

संभावित प्रश्न  

Q. वैदिक कालीन इतिहास के संदर्भ में कौन-सा/से सही सुमेलित नहीं है/हैं?

1- करम्भ  - लकड़ी से निर्मित हल।

2- पर्वरिक्ति  - राजा का प्रधान सेवक।

3- यातुधान  - जादू-टोने से संबंधित तांत्रिक।

कूटः

(a) केवल 2 (b) 1 और 2  

(c) केवल 3  (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं।

उत्तर: (a)

 

विशामत्ता/अक्षवाप/भागदुध

विशामत्ता : उत्तर वैदिक काल में उत्पादन की शक्तियों पर राजन् के नियंत्रण को मजबूत करने के लिए ‘बलि’ नामक कर को अनिवार्य (ऋग्वैदिक काल में स्वैच्छिक होता था) कर दिया गया। इसी संदर्भ में राजन् को विशामत्ता कहा गया है जिसका अर्थ है प्रजा का उपभोग करने वाला।

अक्षवाप : उत्तर वैदिक काल में राजा के प्रमुख रत्निनों में अक्षवाप शामिल था, जो चौसर या पासा (अक्ष) से संबंधित होता था। इसके अलावा, वह आय-व्यय का लेखा-जोखा भी रखता था।

भागदुध :  यह उत्तर वैदिक काल में प्रमुख रत्निनों में से एक था। इसका कार्य उपज में से राजा के भाग का संग्रह करना होता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: वैदिक कालीन इतिहास के संदर्भ में कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?

1- विशामत्ता  - राजन् या राजा

2- अक्षवाप - भूमि की माप करने वाला अधिकारी

3- भागदुध  - उपासना करने वाला श्रेष्ठ पुरोहित

कूटः

(a) 1 और 2  (b) केवल 1 (c) 2 और 3   (d) 1 और 3

उत्तर: (b)

 

द्विज/अग्न्याधेय/गविष्टि

द्विज: उत्तर वैदिक काल में प्रचलित चतुर्वर्ण व्यवस्था (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र) के अंतर्गत पहले तीन वर्णों को द्विज कहा जाता था, जिसका अर्थ होता है पुनः जन्म लेना। द्विजों को ही उपनयन संस्कार का अधिकार प्राप्त था।

अग्न्याधेय उत्तर वैदिक काल में अग्न्याधेय, उपनयन संस्कार के बाद प्राप्त होने वाला अधिकार होता था जो यज्ञों के सम्पादन का अधिकार प्रदान करता था। इस अधिकार के द्वारा ही गृहस्थ जीवन के अनुष्ठानों को संपादित किया जा सकता था।  

गविष्टि वैदिक काल में ‘गाय’ को सबसे पवित्र पशु माना गया है। वैदिक आर्यों के जीवन की महत्वपूर्ण गतिविधियों को ‘गो’ के माध्यम से व्यक्त किया जाता था। इसी क्रम में वैदिक आर्य युद्ध के लिए ‘गविष्टि’ शब्द का प्रयोग करते थे।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: वैदिक कालीन इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- उत्तर वैदिक काल में ब्राह्मण एवं क्षत्रिय वर्ण को ‘द्विज’ भी कहा जाता था।

2- अग्न्याधेय, राजा को दी जाने उपाधि होती थी।

3- गविष्टि, गायों के संरक्षण हेतु नियुक्त अधिकारी था।  

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य नहीं है/हैं?

(a) 1 और 2  (b) केवल 3 (c) 2 और 3   (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (d)

 

कुसीद/उपकुर्वाण/समावर्तन

कुसीद: उत्तर वैदिक काल में वाणिज्य एवं व्यापार हेतु वस्तु विनिमय प्रणाली ही प्रचलित थी तथा ब्याज पर धन देने की प्रथा प्रचलन में थी। तैत्तरीय संहिता में ऋण के लिए ‘कुसीद’ शब्द प्रयुक्त हुआ है तथा शतपथ ब्राह्मण में उधार देने वाले के लिए ‘कुसीदिन’ शब्द का प्रयोग मिलता है।  

उपकुर्वाण: उत्तर वैदिक काल में उपनयन संस्कार के बाद ब्रह्मचर्य आश्रम का प्रारंभ होता था। इसी क्रम में ब्रह्मचारी दो प्रकार के होते थे- 1. उपकुर्वाण - वैसे ब्रह्मचारी, जो विद्याध्ययन समाप्त कर गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करते थे, 2. नैष्ठिक, ऐसे ब्रह्मचारी जीवनपर्यन्त गुरू के पास रहकर विद्याध्ययन करते थे, इन्हें अन्तेवासी भी कहा गया है।

समावर्तन: यह एक प्रकार का संस्कार है जो ब्रह्मचर्य आश्रम से गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करते समय सम्पन्न किया जाता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: वैदिक कालीन इतिहास के संदर्भ में कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?  

1- कुसीद  - ब्याज पर दिया गया धन

2- उपकुर्वाण  - जीवनपर्यन्त गुरू के पास अध्ययन करने वाला ब्रह्मचारी

3- समावर्तन  - अनाज मापने का पात्र

कूटः

(a) केवल 1  (b) 2 और 3 (c) केवल  3  (d) 1 और 2

उत्तर: (a)

 

होतृ/अध्वर्यु/उद्गाता

होतृ : ऋग्वेद का पुरोहित होतृ या होता कहलाता था। इसका कार्य देवताओं को यज्ञ में बुलाना तथा ऋचाओं का पाठ करते हुए देवताओं की स्तुति करना होता था।

अध्वर्यु: यजुर्वेद से संबंधित पुरोहित को अध्वर्यु या याज्ञिक कहते थे। वह इसका पाठ करने के साथ-साथ कुछ हस्तकार्य भी करता था।

उद्गाता: सामवेद से संबंधित पुरोहित उद्गाता कहलाता था। यह सामवेद की ऋचाओं का गायन करता था। ध्यातव्य है कि सामवेद भारतीय संगीत शास्त्र  पर प्राचीनतम पुस्तक है।

इसके अतरिक्त, चौथा पुरोहित ब्रह्मा था जो यज्ञ का निरीक्षण करता था और देखता था कि मंत्रों  का उच्चारण शुद्ध रूप से हो रहा है या नहीं।

 

संभावित प्रश्न 

Q.: वैदिक कालीन इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- ऋग्वेद का पाठ करने वाला होतृ कहलाता था।

2- यजुर्वेद के पुरोहित को उद्गाता कहते थे।

3- सामवेद का गायन करने वाला पुरोहित अध्वर्यु कहलाता था।  

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सत्य नहीं है/हैं?

(a) केवल 1  (b) 2 और 3 (c) 1 केवल  3  (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

 

कर्षापण/वेसवन

कर्षापण: छठी सदी ई.पू. में वस्तुओं के क्रय-विक्रय हेतु कर्षापण (कहापण) नामक सिक्के का प्रयोग होता था। यह चाँदी तथा ताँबे का हो सकता था। इस पर व्यापारी या शिल्पी संघ की छाप होती थी।

वेसवन: बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में यक्ष एवं वृक्ष पूजा का प्रमाण मिलता है। यक्षों के राजा को वेसवन कहा गया है। सबसे उदार एवं परोपकारी यक्ष मणिभद्र था।

 

संभावित प्रश्न 

Q.: महाजनपद कालीन इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- कर्षापण, वस्तुओं के व्यापार हेतु प्रयुक्त स्वर्ण मुद्रा थी।

2- जैन ग्रंथों में ‘वेसवन’ यक्षों के राजा को कहा गया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सत्य नहीं है/हैं?

(a) केवल 1    (b) केवल 2  

(c) 1 और 2 दोनों   (d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (a)

 

गहपति और सेट्ठी

600 ईसा पूर्व से 300 ईसा पूर्व के उत्तरी भारत में हुए सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के परिणामस्वरूप नए सामाजिक एवं आर्थिक वर्गों का उदय हुआ। वस्तुतः वैदिक ग्रंथों में परिवार के मुखिया के लिए प्रयुक्त ‘गृहपति’ शब्द का प्रयोग पालि ग्रंथों (महाजनपद काल) में गिहि, गहपति, गहट्ठ तथा अज्झवसति के रूप में होने लगा। अब ‘गहपति’ शब्द का प्रयोग घर के मुखिया के साथ-साथ धनाढ्य, भूमिपति एवं कृषि संपत्ति के उत्पादन कर्त्ताओं के लिए होने लगा था तथा इनका सामाजिक एवं राजनीतिक महत्व भी बढ़ा।

सेट्ठी संस्कृत शब्द ‘श्रेष्ठिन’ का पालि रूप है एवं पालि ग्रंथों में इन्हें धनाढ्य, व्यवसाय तथा व्यापार एवं सूद के व्यवसाय से संबद्ध बताया गया है। इन शब्दों को कभी एक-दूसरे के लिए प्रयुक्त नहीं किया गया।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: महाजनपदकालीन इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- इस काल में गहपति, नगरीय समुदाय का एक धनाढ्य वर्ग बन गया।

2- सेट्ठी, व्यापार एवं सूद से संबद्ध व्यावसायिक वर्ग था।

3- महाजनपद काल में गहपति एवं सेट्ठी एक-दूसरे के पूरक बन गए।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सत्य है/हैं?

(a) 1 और 3 (b) केवल 2 (c) केवल 3 (d) 1, 2 और 3  

उत्तर: (b)

 

कम्मिक/राजभट

महाजनपद काल में कारवां व्यापारियों को यात्रा के दौरान शुल्क एवं अंतर्राजकीय कर अदा करने पड़ते थे। इसी क्रम में कस्टम के अधिकारियों को ‘कम्मिक’ कहा जाता था, जो विभिन्न उत्पादों पर कर लगाते थे तथा शुल्क की चोरी करने वालों का सामान जब्त कर लिया जाता था।

इसके अतिरिक्त व्यापारियों एवं भिक्षुओं के साथ यात्रा के दौरान लूट-पाट भी की जाती थी। इन यात्रियों के जान-माल की सुरक्षा का उत्तरदायित्व जिन राजकीय अधिकारियों को दिया जाता था, वे ‘राजभट’ कहलाते थे।  

 

संभावित प्रश्न  

Q.: प्राचीन कालीन इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- महाजनपद काल में उत्पादों पर शुल्क आरोपित करने वाले अधिकारी कम्मिक कहलाते थे।

2- राजभट, उत्तर वैदिक काल में राजा को दी जाने वाली उपाधि होती थी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सत्य है/हैं?

(a) केवल 1   (b) केवल 2  

(c) 1 और 2 दोनों    (d) न तो 1, न ही 2  

उत्तर: (a)

 

आपद् धर्म

छठी सदी ईसा पूर्व में वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत वर्ण एवं उनसे संबद्ध व्यवसायों के बीच सिद्धांत एवं व्यवहार के अंतर को स्वीकार किया जाने लगा, जिसे आपद् धर्म सिद्धांत कहा गया। वस्तुतः यह स्वीकार किया जाने लगा कि विपरीत परिस्थितियों में एवं आपदा की स्थिति में जब एक व्यक्ति अपने वर्ण के लिए अपेक्षित व्यवसाय को छोड़कर दूसरे व्यवसायों को अपनाने के लिए बाध्य होता है, जो उस वर्ण के लिए निषेधा भी है, तब इसे आपद् धर्म कहा गया।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: प्राचीन काल में ‘आपद् धर्म’से क्या तात्पर्य था?

(a) विपरीत परिस्थितियों में वर्ण एवं उनसे जुड़े व्यवसाय के इतर अन्य व्यवसायों को अपनाना।

(b) ब्राह्मण एवं क्षत्रिय को उच्च जातियों में रखना।

(c) अंत्यज जातियों द्वारा अपनाया जाने वाला धर्म।

(d) अंतर-वर्णीय विवाह के पश्चात् आरोपित धर्म।

उत्तर: (a)

 

श्रावक/अवसर्पिणी/अमृषा

जैन धर्म में गृहस्थ पुरूषों को श्रावक कहा जाता था, साथ ही गृहस्थ महिलाओं को श्राविका कहा जाता था। इन्हें सम्मिलित रूप से त्रवकाचार कहते थे। जैन धर्म में काल को उत्सर्पिणी एवं अवसर्पिणी के अनंत चक्रों की श्रृंखला में बाँटा गया है। ऐसा माना जाता है कि प्रत्येक उत्सर्पिणी एवं अवसर्पिणी में 24 तीर्थंकरों का उद्भव होता है। वर्तमान समय एक अवसर्पिणी है, जिसका अर्थ होता है ह्रास की अवधि अथवा लौटने वाले आनंद का चक्र। इसके पहले तीर्थंकर ऋषभदेव हुए। जैन धार्म में पाँच महाव्रतों का प्रतिपादन किया गया है। ये पाँच महाव्रत हैं- 1- अहिंसा, 2- अमृषा (सत्य बोलना), 3- अस्तेय (अचौर्य), 4- ब्रह्मचर्य, 5- अपरिग्रह (संग्रह न करना)। इनका उद्देश्य अंतर्मन का परिष्करण है। ।  

 

संभावित प्रश्न  

Q.: निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए-

1- श्रावक - उच्च पद प्राप्त पुजारी

2- अवसर्पिणी - विकास की अवधि

3- अमृषा - सत्य बोलना

उपर्युक्त में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?

(a) 1 और 2 (b) केवल 2 (c) केवल 3 (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)

 

प्रव्रज्या एवं उपसम्पदा

बौद्ध पंथ के अनुसार जब कोई भिक्षु अपना गृहत्याग कर किसी बौद्ध आचार्य की शरण में एक परिव्राजक (संन्यासी) जीवन जीने का निर्णय लेता था, तो उस संस्कार को प्रव्रज्या (पबज्जा) कहा जाता था। इस अवसर पर वह अपने केशों का त्याग कर गेरुए वस्त्र धारण कर लेता था। इसके बाद वह बुद्ध, धा तथा संघ की शरण में जाने की शपथ लेता था। इसी क्रम में जब भिक्षु द्वारा बौद्ध संघ की स्थायी सदस्यता ग्रहण कर ली जाती थी, तो यह अवस्था उपसम्पदा कहलाती थी। इसके बाद उसे धर्माभिषिक्त स्वीकार कर लिया जाता था। एक बौद्ध भिक्षु के पास आठ व्यक्तिगत वस्तुएँ होती थीं - तीन वस्त्र, एक भिक्षापात्र, छुरा, सुई, कमर में बाँधने के लिए एक पेटी एवं एक कमंडल।

 

संभावित प्रश्न  

Q. भारतीय धार्मिक इतिहास में ‘प्रव्रज्या’एवं ‘उपसम्पदा’अवस्थाएँ किस संप्रदाय से संबंधित थीं?

(a) जैन पंथ  (b) बौद्ध पंथ

(c) शैव पंथ   (d) आजीवक पंथ

उत्तर: (b)

 

उपोसथ एवं पाराजिक

बौद्ध धर्म के अंतर्गत ज्येष्ठ पूर्णिमा एवं अमावस्या को उस क्षेत्र  में निवास करने वाले संघ के सभी सदस्यों के उपोसथ नामक अनुष्ठान में शामिल होने की परंपरा प्रचलित थी जिसमें ‘पातिमोक्ख के नियमों’ को दोहराया जाता था। ध्यातव्य है कि विनयपिटक में संघ के आचरण को भंग करने के विरुद्ध नियमों का संकलन किया गया है। इसी क्रम में संघ के विरुद्ध सबसे गंभीर प्रकृति के चार अपराधों को ‘पाराजिक’ कहा गया है, जिनके आधार पर किसी भी सदस्य को संघ से निष्कासित किया जा सकता था। ये चार अपराध इस प्रकार हैं- संभोग, उसे लेना जो न दिया गया हो, किसी की हत्या करना एवं आध्यात्मिक उपलब्धि की झूठी घोषणा करना।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: प्राचीन धार्मिक इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- बौद्ध संघ का उच्च पद प्राप्त पुजारी उपोसथ कहलाता था।

2- जैन धर्म में पाराजिक, यायावर जीवन जीने वाले साधुओं को कहा जाता था।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य नहीं है/हैं?

(a) केवल 1   (b) केवल 2  

(c) 1 और 2 दोनों    (d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (c)

 

उपासक एवं वेवन्नियन्ति

बौद्ध धर्म के अनुयायियों के समक्ष दोनों विकल्प उपलब्ध थे- प्रथम, वे संघ के भीतर रह सकते थे तथा द्वितीय, वे संघ के बाहर सामान्य गृहस्थी के रूप में रह सकते थे। गृहस्थी के रूप में रहने वाले इन सामान्य बौद्ध अनुयायियों को उपासक कहा जाता था, साथ ही महिला अनुयायियों को उपासिका कहा जाता था। बौद्ध धर्म के ये सदस्य बुद्ध, धम्म एवं संघ के शरणागत होने की शपथ लेते थे, ये केवल संघीय शपथों से मुक्त होते थे।

अंगुत्तर निकाय के अनुसार, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र अर्थात् किसी भी वर्ण का व्यक्ति जब संघ में प्रवेश पा लेता है, तो वह वर्णविहीन हो जाता है जिसके लिए ‘वेवन्नियन्ति’शब्द प्रयुक्त हुआ है।  

 

संभावित प्रश्न  

Q.: भारतीय धार्मिक इतिहास में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- जैन धर्म का सामान्य गृहस्थी, उपासक कहलाता था।  

2- जैन धर्म में वस्त्र त्याग देने वाले साधु वेवन्नियन्ति कहलाते थे।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य नहीं है/हैं?

(a) केवल 1 (b) केवल 2 (c) 1 और 2 दोनों (d) न तो 1, न ही  

उत्तर: (c)

 

पटिच्च सम्मुपाद

पटिच्च सम्मुपाद या प्रतीत्य समुत्पाद बौद्ध दर्शन का सार है, जिसे आश्रित उत्पत्ति का सिद्धान्त कहते हैं। यह द्वितीय एवं तृतीय आर्य सत्यों में निहित है। इसके अनुसार प्रत्येक कारण का एक कार्य होता है एवं प्रत्येक कार्य का एक कारण। एक कर्म के उत्पन्न होने से दूसरा उत्पन्न होता है एवं एक कर्म के विनाश से दूसरे का विनाश होता है। इस प्रकार इसके द्वारा एक ओर सभी घटनाओं की व्याख्या दी जा सकती थी एवं साथ में दुःख की भी।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: प्राचीन धार्मिक इतिहास में ‘पटिच्च सम्मुपाद’ का सिद्धान्त किस धार्मिक संप्रदाय से संबंधिात था?

(a) जैन मत  (b) आजीवक संप्रदाय

(c) बौद्ध मत  (d) शैव मत

उत्तर: (c)

 

सार्थवाह/भागदुध/रज्जुग्राहक

महाजनपद काल में शिल्प एवं उद्योगों के विकास ने व्यापारिक वस्तुओं के आयात-निर्यात को बढ़ावा दिया। इसी क्रम में 500-1000 गाड़ियों के साथ माल लेकर व्यापारियों के कारवां का प्रचलन बढ़ा। इन्हीं व्यापारिक काफि़लों में चलने वाले व्यापारी सार्थवाह कहलाते थे। वे एक मुखिया सार्थवाहजेठक के नेतृत्व में दूर-दूर तक यात्रा करते थे।

इसके अलावा, इस काल में करारोपण प्रणाली भी नियमित हो गई तथा बलि, शुल्क एवं भाग नामक कर पूर्णतः स्थापित हो गए। कर को खजाने में जमा करने एवं खजाने की देखरेख के लिए भागदुध, शौल्किक एवं भण्डागारिक जैसे अधिकारी नियुक्त किए जाते थे। साथ ही भूमि की माप करने वाला अधिकारी रज्जुग्राहक कहलाता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?

1- सार्थवाह  - सातवाहनों के सामंत

2- भागदुध  - गौशाला का प्रमुख

3- रज्जुग्राहक  - भूमि की माप करने वाला अधिकारी

कूटः

(a) केवल 3 (b) 1 और 2 (c)  केवल 2  (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)

 

अनेकांतवाद और स्यादवाद

जैन धर्म के एक महत्वपूर्ण दर्शन को अनेकांतवाद एवं स्यादवाद के नाम से जाना जाता है। अनेकांतवाद सिद्धांत के अनुसार, एक सत्य या यथार्थ को कई आयामों में देखा जा सकता है अर्थात् यथार्थ की जटिल एवं बहुआयामी संरचना होती है। इसका मानना है कि सत्य की अनेक अवस्थाएं होती हैं। स्यादवाद, अनेकांतवाद से ही जुड़ा है तथा ज्ञान की सापेक्षता का सिद्धान्त है। इसके अनुसार, सांसारिक वस्तुओं के विषय में हमारे सभी निर्णय सापेक्ष एवं सीमित होते हैं। न तो हम किसी को पूर्ण रूप से स्वीकार कर सकते हैं और न ही अस्वीकार। अतः हमें प्रत्येक निर्णय के पूर्व स्यात् (शायद) लगाना चाहिए। इसे सप्तभंगी सिद्धांत भी कहते हैं जिसमें सत्य की सात अवस्थाओं को बताया गया है। जैसेः- है, नहीं है, है और नहीं है, कहा नहीं जा सकता है, है किंतु कहा नहीं जा सकता, नहीं है और कहा नहीं जा सकता, है, नहीं है और कहा नहीं जा सकता।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: निम्नलिखित में से कौन-सा पंथ ‘अनेकांतवाद’ का प्रतिपादन करता है?

(a) बौद्ध पंथ   (b) जैन पंथ  

(c)  आजीवक   (d) शैव पंथ

उत्तर: (b)

 

आश्रव/संवर/निर्जरा

जैन धर्म में कर्म सिद्धांत पर बल दिया गया है। इसके अनुसार कर्मों के आधार पर जीवों का देहान्तरण होता है। कर्म को वैसे भौतिक पदार्थों के रूप में समझा जाता है जो स्वतंत्र रूप से आकाश में तैरते हैं। इनमें से कुछ भ्रमोत्पादक कर्मों के द्वारा जीव की चेतना, सुख और ऊर्जा तीनों बाधित हो जाती हैं। जीव की तरफ़ कर्मों का आकर्षण वासना, तृष्णा, घृणा आदि के सम्पर्क में आने से होता है। वह स्थिति, जब कर्म आकर्षित होकर जीव की ओर प्रवाहित होता है, आश्रव कहलाती है। सही ज्ञान एवं प्रयासों के द्वारा जीव की ओर कर्मों के बहाव को रोका जा सकता है जिसे संवर कहते हैं। जब पहले से जीव में व्याप्त कर्म समाप्त होता है तो उस अवस्था को ‘निर्जरा’ कहते हैं। इसके बाद की स्थितियों से गुजरने के बाद जीव कर्मों के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: प्राचीन कालीन धार्मिक इतिहास में ‘आश्रव’, ‘संवर’एवं ‘निर्जरा’की अवधारणाएँ किस धर्म/पंथ से संबंधित है/हैं?

(a) बौद्ध धर्म (b) जैन धर्म (c) आजीवक (d) ब्राह्मण धर्म

उत्तर: (b)

 

त्रिरत्न

जैन धर्म के अनुसार मोक्ष की प्राप्ति के लिए त्रिरत्न का अनुसरण आवश्यक माना जाता है। ये त्रिरत्न हैं- सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चरित्र एवं सम्यक् दर्शन। जैन धर्म एवं उसके सिद्धांतों का ज्ञान ही सम्यक् ज्ञान है जो पाँच प्रकार का होता है- मति (इन्द्रय जनित ज्ञान), श्रुति (श्रवण से प्राप्त ज्ञान), अवधि (दिव्य ज्ञान), मनः पर्याय (दूसरे के मन की बात जान लेना एवं कैवल्य ज्ञान (सर्वोच्च ज्ञान)। सम्यक् चरित्र का तात्पर्य है जो कुछ जाना जा चुका है और सत्य माना जा चुका है उसे कार्यरूप में परिणत करना। इसके अंतर्गत भिक्षुओं के पाँच महाव्रतों- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह एवं ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थों के लिए पाँच अणुव्रतों का पालन आवश्यक बताया गया है।

जैन तीर्थंकरों एवं उनके उपदेशों में दृढ़ आस्था तथा श्रद्धा रखना ही सम्यक् दर्शन है। इसके आठ अंग बताए गए हैं। उपरोक्त त्रिरत्नों के अनुसरण से जीव संवर को प्राप्त कर लेता है।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: जैन धर्म, के त्रिरत्नों में निम्नलिखित में से कौन-सा शामिल नहीं है/हैं?

(a) सम्यक् ज्ञान   (b) सम्यक् संकल्प  

(c) सम्यक् चरित्र    (d) सम्यक् दर्शन

उत्तर: (b)

 

तिर्यंच एवं निगोद

जैन धर्म का अहिंसा सिद्धांत जीवन के विभिन्न रूपों से संबद्ध है। इसी क्रम में जैन दर्शन अस्तित्व के चार रूपों- देव, मनुष्य, नरकी तथा तिर्यंच को स्वीकार करता है। इनमें तिर्यंच का तात्पर्य पेड़-पौधों एवं जीव-जंतुओं से है। अस्तित्व के तिर्यंच रूपों को उनकी चेतन क्षमता के आधार पर पुनः उपश्रेणियों में बाँटा गया है। इनमें सबसे निचले स्तर पर एकेन्द्रीय शरीर आते हैं एवं इनमें से भी सबसे निचले स्तर पर वैसे जीव आते हैं जो केवल स्पर्श इन्द्रिय से युक्त होते हैं, ये जीव निगोद कहलाते हैं।  

 

संभावित प्रश्न  

Q.: प्राचीन कालीन धार्मिक इतिहास में ‘तिर्यंच’एवं ‘निगोद’शब्द किस धर्म/पंथ में प्रयुक्त हुए हैं?

(a) शैव पंथ   (b) शाक्त पंथ

(c) बौद्ध पंथ    (d) जैन पंथ

उत्तर: (d)

 

श्वेतांबर एवं दिगंबर

लगभग 300 ईसा पूर्व के दौरान जैन धर्म दो हिस्सों में बँट गया। दरअसल, इस दौरान मगध में भयंकर अकाल पड़ा जिसकी वजह से कुछ जैन भिक्षु, आचार्य भद्रबाहु के नेतृत्व में दक्षिण की ओर चले गए। कालांतर में उनके शिष्य दिगंबर कहलाए। जो भिक्षु अकाल के समय में भी स्थूलभद्र के नेतृत्व में मगध में रह गए तथा कालांतर में श्वेत वस्त्र पहनने लगे, वे श्वेतांबर कहलाए।

 

इन दोनों संप्रदायों के सिद्धांतों में अंतर इस प्रकार थे-

• श्वेतांबर मोक्ष प्राप्ति हेतु वस्त्रों का त्याग आवश्यक नहीं समझते थे जबकि दिगंबर वस्त्र त्याग को आवश्यक मानते थे।

• श्वेतांबर के अनुसार कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति के बाद भी लोगों को भोजन की आवश्यकता रहती है किंतु दिगंबर के अनुसार आदर्श साधु भोजन ग्रहण नहीं करते हैं।

• श्वेतांबर इसी जीवन में स्त्रियों को निर्वाण का अधिकारी मानते थे जबकि दिगंबर इसका विरोध करते थे।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: श्वेतांबर एवं दिगंबर जैन संप्रदायों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-  

1- श्वेतांबर, स्त्रियों को इसी जीवन में मोक्ष की प्राप्ति का अधिाकारी नहीं मानते थे।

2- आचार्य भद्रबाहु के नेतृत्व में दक्षिण जाने वाले भिक्षु दिगंबर कहलाए।

3- दिगंबर, निर्वाण हेतु वस्त्र त्याग को आवश्यक मानते थे।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1   (b) 2 और 3

(c) केवल 3    (d) 1 और 3

उत्तर: (b)

 

माध्यमिक एवं योगाचार

माध्यमिक एवं योगाचार महायान बौद्ध शाखा के प्रमुख सम्प्रदाय हैं। माध्यमिक या शून्यवाद मत का आरंभ नागार्जुन द्वारा किया गया। उन्होंने ‘माध्यमिककारिका’ एवं ‘प्रज्ञापारमिताशास्त्र’ नामक ग्रंथों की रचना की। इस मत में महात्मा बुद्ध के मध्यम मार्ग (Golden Mean) पर अधिक बल दिया गया है। यह सम्प्रदाय शून्य को ही अंतिम सत्य स्वीकार करता है। इसे ‘सापेक्षवाद’भी कहते हैं। इसके अनुसार प्रत्येक वस्तु किसी न किसी कारण से उत्पन्न हुई और वह उस पर निर्भर है।

योगाचार या विज्ञानवाद के जनक मैत्रेय (मैत्रेयनाथ) थे। इन्होंने ‘अभिसमयालंकार’ नामक ग्रंथ लिखा। आगे असंग एवं वसुबन्धु ने इसका विकास किया। इस मत में योग एवं आचार पर विशेष बल दिया गया। इस मत का सर्वाधिक विकास गुप्तकाल में देखा गया। ‘लंकावतार एवं ‘संधिनिर्माचन’ इस मत के प्रमुख ग्रंथ हैं। लंकावतार में बौद्ध वर्ग के दर्शन ‘पंचशील सिद्धांत’का उल्लेख है।  

 

संभावित प्रश्न  

Q.: प्राचीनकालीन धार्मिक इतिहास में ‘माध्यमिक’ एवं ‘योगाचार’ किस मत/संप्रदाय से संबंधित थे?

(a) हीनयान (b) लोकायत (c) महायान (d) दिगंबर

उत्तर: (c)

 

 

वज्रयान एवं सहजयान

वज्रयान एवं सहजयान सम्प्रदायों का विकास बौद्ध धर्म के अंतर्गत हुआ। वज्रयान सम्प्रदाय का उद्भव 5वीं-छठी शताब्दी के मध्य हुआ। यह ज्ञान एवं आचार के स्थान पर तंत्र-मंत्र, माँस आदि पर बल देता है। इसे ‘हीरकयान’भी कहा जाता है। वज्रयान में महात्मा बुद्ध को आदि बुद्ध कहा जाता है।

सहजयान सम्प्रदाय का उद्भव पाल वंश के काल में वज्रयान के तंत्र मंत्र एवं कर्मकाण्ड के विरोध में हुआ था। यह भी तांत्रिक सम्प्रदाय था किंतु इसका मुख्य बल योग क्रिया पर दिया जाता था। इसमें गुरुकृपा, चर्यापद एवं दोहों को विशेष महत्व दिया जाता था। इसके प्रतिपादक ‘सरह’ थे।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: प्राचीनकालीन धार्मिक इतिहास में ‘वज्रयान’ एवं ‘सहजयान’ किस मत/संप्रदाय के उपसंप्रदाय थे?

(a) जैन मत    (b) कापालिक  

(c) बौद्ध मत     (d) लिंगायत

उत्तर: (c)

 

सांख्य दर्शन

सांख्य दर्शन का प्रतिपादन कपिल मुनि द्वारा किया गया था। यह सबसे प्राचीनतम षड्दर्शन है जिस पर जैन धर्म का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा। इसके अनुसार, सृष्टि का उद्भव ईश्वर से न होकर पुरुष एवं प्रकृति के संयोजन से हुआ है। इसे ही इसका सत्कार्यवाद का सिद्धांत भी कहते हैं। साथ ही यह त्रिगुण सिद्धांत - सत्, रजस्, तमस् को भी मानता है। इस दर्शन की उत्पत्ति अवैदिक श्रमण विचारधारा से हुई थी। इसमें 25 तत्वों का वर्णन किया गया है। इसीलिए इसे संख्या का दर्शन कहा जाता है। सांख्यकारिका इसका प्राचीनतम ग्रंथ है।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: सांख्य दर्शन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- यह षड्दर्शनों में सबसे प्राचीनतम है।

2- यह सृष्टि की उत्पत्ति ईश्वर से नहीं मानता है।

3- इसके प्रवर्तक कणाद मुनि थे।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1  (b) 2 और 3 (c) 1 और 2  (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)

 

योग दर्शन

योग दर्शन का प्रतिपादन महर्षि पतंजलि द्वारा किया गया था। उनके द्वारा ‘योगसूत्र’ की रचना की गई जिसमें आष्टांगिक मार्ग की व्याख्या दी गई है। उनके अनुसार, आसन एवं प्राणायाम के माध्यम से ईश्वर (मोक्ष) की प्राप्ति की जा सकती है। इस दर्शन में सांख्य दर्शन द्वारा प्रतिपादित 25 तत्वों के साथ-साथ ईश्वर के अस्तित्व को भी स्वीकार किया गया है। अतः इसे ईश्वर-सांख्य भी कहा जाता है।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: योग दर्शन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- इसके प्रवर्तक महर्षि पाणिनी थे।

2- इसमें ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार किया गया है।

3- इसे ईश्वर-सांख्य कहा जाता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) 1 और 2  (b) 2 और 3 (c)  केवल 2  (d) 1, 2 और 3  

उत्तर: (b)

 

न्याय दर्शन

न्याय दर्शन का प्रतिपादन महर्षि गौतम (अक्षपाद) ने किया था। इस दर्शन को आन्वीक्षकी के नाम से जाना जाता है। गौतम द्वारा न्याय सूत्र की रचना की गई जो भारतीय तर्क विद्या का प्राचीनतम ग्रंथ है। इसमें 16 तत्वों तथा ईश्वर की सत्ता का अस्तित्व स्वीकार किया गया है। इसके अनुसार, तर्क (प्रमाण) के आधार पर ही किसी बात को स्वीकार करना चाहिए। इसमें प्रमाण की चार विधियों-प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान एवं शब्द का उल्लेख किया गया है। उद्योतकर, वाचस्पति, उदयन, जयन्त, पक्षिलस्वामी वात्स्यायन इस दर्शन के अन्य दार्शनिक हैं।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: न्याय दर्शन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- इसका प्रतिपादन महर्षि जैमिनी ने किया था।

2- इसमें ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया गया है।

3- पक्षिलस्वामी वात्स्यायन न्याय दर्शन से संबद्ध थे।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) 1 और 2  (b) केवल 3 (c) 1 और 2  (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

 

वैशेषिक दर्शन

वैशेषिक दर्शन के प्रतिपादक कणाद मुनि थे। इन्होंने वैशेषिक सूत्रों  की रचना की। इन्होंने ही भारत में परमाणुवाद की स्थापना एवं भौतिक शास्त्र का आरंभ किया। इनका मानना था कि 5 विशेष पदार्थ या पंचमहाभूत - पृथ्वी, आकाश, जल, पवन एवं अग्नि के संयोजन से ही नई वस्तुएँ बनती हैं। वैशेषिक दर्शन, न्याय दर्शन से संबद्ध है। ‘विशेष’ नामक पदार्थ पर अधिक बल देने के कारण इसे वैशेषिक दर्शन कहा गया। पदार्थों की संख्या मूल रूप से 6 (द्रव्य, गुण, कर्म, विशेष, सामान्य और समवाय) थी जो आगे चलकर 7 (अभाव) हो गई।    

 

संभावित प्रश्न  

Q.: वैशेषिक दर्शन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- इसके प्रवर्तक महर्षि गौतम थे।

2- इसके द्वारा परमाणुवाद की संकल्पना प्रस्तुत की गई।

3- इसमें प्रमाण की चार विधिायाँ - प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान एवं शब्द बतायी गई हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1  (b) 2 और 3 (c) 1, 2 और 3  (d)  केवल 2

उत्तर: (d)

 

पूर्व-मीमांसा दर्शन

मीमांसा या पूर्व-मीमांसा दर्शन का प्रतिपादन महर्षि जैमिनी ने किया था। इस दर्शन में वैदिक कर्मकाण्डों को अधिक मान्यता दी गई है। इसके अनुसार, वेदों द्वारा निर्दिेष्ट कर्म ही धर्म है। अतः इसके द्वारा यज्ञवाद को समर्थन किया गया। यह वेदों को नित्य एवं अपौरुषेय मानता है तथा इसका मानना है कि वैदिक देवताओं का मंत्रों से पृथक् कोई अस्तित्व नहीं है। कुमारिल भट्ट एवं प्रभाकर भट्ट इसी दर्शन से जुड़े थे। कुमारिल ने बौद्धों का खण्डन कर वेदों की प्रामाणिकता को पुनः स्थापित किया।    

 

संभावित प्रश्न  

Q.: पूर्व-मीमांसा दर्शन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- इसके प्रवर्तक महर्षि जैमिनी थे।

2- इसमें वैदिक कर्मकाण्डों की आलोचना की गई है।

3- कुमारिल भट्ट इसी दर्शन से जुड़े थे।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही नहीं है/हैं?

(a) केवल 3  (b) 1 और 2 (c) केवल 2  (d)  1, 2 और 3

उत्तर: (c)

 

उत्तर-मीमांसा दर्शन

उत्तर मीमांसा या वेदांत दर्शन का प्रतिपादन बादरायण द्वारा किया गया था। इन्होंने ‘ब्रह्मसूत्र’ नामक ग्रंथ लिखा। इस दर्शन का आधार वेदान्त अर्थात् उपनिषद एवं उसमें वर्णित ज्ञानकाण्ड है। इसके अनुसार, ब्रह्म ही वास्तविक सत्य है एवं शेष सब कुछ माया है। आगे चलकर शंकराचार्य एवं रामानुजाचार्य ने ब्रह्मसूत्र पर दो भाष्य लिखे। शंकराचार्य निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे तथा मोक्ष प्राप्ति का आधार ज्ञान को मानते थे, जबकि रामानुजाचार्य सगुण ब्रह्म के उपासक थे एवं मोक्ष प्राप्ति का साधन भक्ति को मानते थे।  

 

संभावित प्रश्न  

Q.: उत्तर-मीमांसा के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- उत्तर मीमांसा दर्शन का प्रतिपादन महर्षि बादरायण ने किया था।

2- इस दर्शन का मूल आधार उपनिषद हैं।

3- ब्रह्मसूत्र के रचयिता ब्रह्मगुप्त इसी दर्शन से संबद्ध थे।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1  (b) केवल 3 (c) 1 और 2  (d)  2 और 3

उत्तर: (c)

 

लाकुल सम्प्रदाय

लाकुल या पाशुपत सम्प्रदाय, शैव धर्म का सबसे प्राचीनतम सम्प्रदाय है। इसकी स्थापना द्वितीय शताब्दी ई.पू. में लकुलीश द्वारा की गई थी। उन्हें शिव का 18वाँ अवतार माना जाता है। वे कृष्ण-द्वैपायन के समकालीन थे। उन्होंने पंचार्थविद्या नामक ग्रंथ की रचना की। इस सम्प्रदाय के अनुयायी 5 पदार्थों - कार्य, कारण, योग, विधि एवं दुःखान्त की सत्ता में विश्वास रखते थे।  पाशुपतसूत्र एवं वायुपुराण से इस सम्प्रदाय के सिद्धांतों का ज्ञान होता है।    

 

संभावित प्रश्न  

Q.: लाकुल सम्प्रदाय के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- यह वैष्णव धर्म का सबसे प्राचीनतम सम्प्रदाय है।

2- इसके संस्थापक लकुलीश थे।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1   (b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों   (c)  न तो 1, न ही 2

उत्तर: (b)

 

कापालिक सम्प्रदाय

कापालिक, शैव धर्म का सम्प्रदाय है। इस सम्प्रदाय के ईष्टदेव भगवान शिव के अवतार भैरव हैं। इस सम्प्रदाय के अनुयायी नर-कपाल में भोजन, शव की भस्म का लेपन, माँस भक्षण एवं सुरापान आदि करते थे। ये वर्णभेद को नहीं मानते थे, साथ ही इसमें महिलाएँ भी शामिल हो सकती थीं। संगम साहित्य मणिमेखलै में कापालिकों को कट्टर शैव के रूप में वर्णित किया गया है।  

संभावित प्रश्न  

Q.: निम्नलिखित धर्म/मतों में से ‘कापालिक’ किस धर्म या मत का उपसम्प्रदाय था?

(a) वैष्णव धर्म   (b) शाक्त धर्म  

(c) शैव धर्म   (d)  जैन धर्म

उत्तर: (c)

 

लिंगायत या वीरशैव संप्रदाय

लिंगायत, शैव धर्म का एक उपसंप्रदाय है जिसकी स्थापना 12वीं सदी में बसव द्वारा कर्नाटक में की गई थी। यह संप्रदाय इस्लाम से प्रभावित था। चन्नवसव एवं एकान्तदरामय्य इसी संप्रदाय से जुड़े हुए थे। लिंगायत संप्रदाय ब्राह्मण विरोधी है। यह मूर्तिपूजा, पुनर्जन्म, वेद एवं यज्ञ, पशुबलि आदि को अस्वीकार करता है तथा अहिंसा एवं शाकाहार पर बल देता है। इसमें विधवा विवाह को मान्यता दी गई है तथा दाह-संस्कार का विरोध किया गया है। लिंगायत 63 नयनारों को अपना प्राचीनतम गुरु मानते हैं।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: लिंगायत संप्रदाय के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- इसकी स्थापना 12वीं सदी में बसव द्वारा की गई थी।

2- इसमें मूर्तिपूजा एवं वैदिक कर्मकाण्ड पर बल दिया गया है।

3- इसमें विधवा विवाह को अस्वीकार किया गया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) 1 और 3  (b) केवल 2

(c) केवल 1  (d)  1, 2 और 3

उत्तर: (c)

 

शिल्पादिकारम

शिल्पादिकारम, संगम युग में लिखा गया तमिल भाषा का पहला काव्य ग्रंथ है। इसकी रचना इलंगोआदिगल द्वारा की गई थी जो जैन धर्मानुयायी था। इसे तमिल साहित्य का रत्न माना जाता है। इसमें कोवलन, उसकी पत्नी कन्नगी एवं कावेरीपट्टनम की गणिका माधवी की कथा का वर्णन है। कोवलन को पाण्ड्य शासक नेंडुजेलियन ने फ़ाँसी दी थी जिससे क्रोधित होकर कन्नगी ने पूरे मदुरै को जला डाला और चेर राज्य चली गई। कन्नगी को चेर राज्य में सतीत्व की देवी के रूप में पूजा जाने लगा। इसमें मगध, वज्जि एवं अवंति राज्यों का भी उल्लेख हुआ है।

 

संभावित प्रश्न  

Q. शिल्पादिकारम के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- यह तमिल भाषा का पहला काव्य ग्रंथ है।

2- इसके लेखक तिरुवल्लुवर थे।

3- इसमें कन्नगी पूजा का उल्लेख मिलता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1   (b) 2 और 3  

(c) 1 और 3    (d)  1, 2 और 3

उत्तर: (c)

 

मणिमेखलै

मणिमेखलै संगम साहित्य के 5 महाकाव्यों में से एक है। इसके लेखक सीतलैसत्तनार (सत्तनार) थे। इसमें 30 सर्ग और एक प्रस्तावना है। तर्कशास्त्र की व्याख्या के साथ-साथ इसमें महायान बौद्ध सम्प्रदाय का भी वर्णन किया गया है। दरअसल, यह शिल्पादिकारम में वर्णित कथा का अगला भाग है। इसकी नायिका कोवलन और माधवी की पुत्री मणिमेखलै है जिसे वैदिक, शैव, वैष्णव, लोकायत, आजीवक, सांख्य आदि दर्शनों का ज्ञान था और अंत में वह बौद्ध भिक्षुणी बन जाती है। यह एक बौद्ध पुस्तक है जिसमें केवल बौद्ध धर्म का गुणगान वर्णित है।

 

संभावित प्रश्न  

Q. ‘मणिमेखलै’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- इसकी रचना मामलूनार द्वारा की गई।

2- इसमें शिल्पादिकारम में वर्णित कथा से आगे की कथा वर्णित है।

3- इसमें केवल बौद्ध धर्म की प्रशंसा की गई है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 (b) 2 और 3 (c) 1 और 2  (d)  केवल 2

उत्तर: (b)

 

कारवेन/नालवै/पेरुनल

संगम काल में वंशानुगत राजतंत्र की व्यवस्था प्रचलित थी। राजा द्वारा कारवेन, को, इरैवन एवं अधिराज की उपाधिायाँ धारण की जाती थीं। देवता एवं राजा दोनों ‘को’ कहलाते थे।

इस काल में राजा के दरबार के लिए ‘नालवै’ शब्द का प्रयोग होता था एवं नालवै का सबसे बड़ा उत्सव राजा का जन्मदिवस होता था जिसे पेरुनल कहा जाता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q. संगम युग के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?

1- कारवेन  -  सेनापति

2- नालवै -  सिंचाई कर

3- पेरुनल -  राजा का जन्मदिवस

कूटः

(a) केवल 3  (b) 1 और 2  

(c) 1, 2  और 3   (d)  केवल 2

उत्तर: (b)

 

कोमहन/पंचावरम/ओर्रार

संगम युग में राजा के पुत्रों के लिए ‘इलैगो’ शब्द का प्रयोग किया जाता था। किंतु ‘युवराज’ बनने वाला पुत्र ‘कोमहन’ कहलाता था।

राजा को प्रशासनिक कार्यों में सहायता हेतु पाँच लोगों की एक परिषद् होती थी जिसे ‘पंचावरम’ कहा जाता था। इस संस्था के सदस्य अमैच्चर या मंत्री, पुरोहित, सेनापति, दूत एवं ओर्रार या वै थे। गुप्तचर को ओर्रार कहा जाता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q. संगम युग के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित  है/हैं?

1- कोमहन  -  प्रधान पुरोहित

2- पंचावरम -  भू-पैमाइश पद्धति

3- ओर्रार -  गुप्तचर

कूटः

(a) केवल 3 (b) 1 और 2 (c) 1, 2  और 3  (d)  केवल 2

उत्तर: (a)

 

कलतिक/कनतिकन/मनरम/पदै

संगम कालीन प्रशासनिक संरचना के अंतर्गत मोती के व्यापार से संबद्ध अधिकारी ‘कलतिक’ कहलाता था। इसकी चर्चा मंगुलम अभिलेख में मिलती है। साथ ही सर्वोच्च लेखाकार कनतिकन कहलाता था।

राजा का न्यायालय ‘मनरम’ कहलाता था। जो सर्वोच्च न्यायालय होता था। इसके अलावा, ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायतों का भी गठन होता था। इस काल में सेना के लिए ‘पदै’ शब्द का प्रयोग किया जाता था जिसमें पैदल, हाथी, घोड़े एवं रथ होते थे।

 

संभावित प्रश्न  

Q. संगम युग के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित  है/हैं?

1- कलतिक  -  मोती वाणिज्य अधिकारी

2- कनतिकन -  भू-राजस्व अधिकारी

3- मनरम -  राजा का न्यायालय

4- पदै - घुड़सवार सैनिक

कूटः

(a) 1 और 3 (b) 2 और 4 (c) केवल 3  (d)  1, 2, 3 और 4

उत्तर: (a)

 

एनाड़ि/मारया/नाडुकल

संगम कालीन सैन्य प्रशासन के अंतर्गत सेनापति को एनाड़ि कहा जाता था। युद्ध भूमि में वीरता एवं शौर्य का प्रदर्शन करने वाले सैनिक को ‘मारया’ की उपाधि दी जाती थी। साथ ही युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के सम्मान में एक पाषाण स्तम्भ खड़ा किया जाता था जिसे नाडुकल या वीरगल कहते थे। इसकी देवता के समान पूजा की जाती थी।

 

संभावित प्रश्न  

Q. संगम युग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- इस काल में सेनापति को एनाड़ि कहा जाता था।

2- युद्ध भूमि में शौर्य का प्रदर्शन करने वाले सैनिक को ‘वेडैलियर’ की उपाधिा दी जाती थी।

3- शहीद सैनिकों के सम्मान में निर्मित प्रस्तर स्तंभ को कुरिन्जी कहा जाता था।  

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) 1 और 3 (b) केवल 1 (c) 2  और 3  (d)  1, 2 और 3

उत्तर: (b)

 

 

कुटी/अरसर/कबिदी

संगमकालीन समाज में जाति व्यवस्था का विकास न होने के कारण सामाजिक विभाजन ‘कुटी’ पर आधारित था। दरअसल, कुटी, प्रारंभिक तमिल कृषि समाजों में संयुक्त परिवार एवं वंशानुगत रिश्तों पर आधारित समुदाय को कहते थे।

संगम युगीन समाज में शासक वर्ग के लिए ‘अरसर’शब्द का प्रयोग किया जाता था।

संगम काल के दौरान सैन्य एवं असैन्य अधिकारी, बड़े या धनी किसानों को वल्लाल कहा जाता था। चोल राज्य में इन्हें ‘वेल’ एवं ‘अरशु’ तथा पाण्ड्य राज्य में कबिदी कहा जाता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q. संगमयुगीन समाज के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए-

1- कुटी - संयुक्त परिवार

2- अरसर - भूमिहीन किसान

3- कबिदी - धानी किसान

उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

(a) 1 और 3 (b) 2 और 3 (c) केवल 1 (d)  1, 2 और 3

उत्तर: (a)