Aug. 18, 2021

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                 कार्टेज व्यवस्था

पुर्तगाली कंपनी ने भारतीय समुद्र पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए आक्रामक नीतियाँ प्रारंभ कीं। इसी क्रम में पुर्तगालियों द्वारा अपने अधीन प्रमुख सामुद्रिक मार्गों पर ‘सुरक्षा कर’वसूल करने की पद्धति को कार्टेज व्यवस्था कहा जाता था। इसके अंतर्गत पुर्तगाली प्रभुत्व वाले क्षेत्र से गुजरने वाले प्रत्येक भारतीय व्यापारिक जहाज को अपने व्यापार के लिए पुर्तगालियों से पारपत्र (परमिट) खरीदना होता था। यदि व्यापारिक जहाज ऐसा करने से इंकार करता था, तो उसके जहाज और माल दोनों को जब्त कर लिया जाता था।

ध्यातत्व है कि पुर्तगालियों ने ही भारत में तम्बाकू की खेती का प्रचलन प्रारंभ किया तथा 1556 ई. में भारत में पहली प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना भी की।

 

संभावित प्रश्न  

Q.- पुर्तगालियों द्वारा प्रारंभ कार्टेज व्यवस्था क्या थी?

(a) प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना हेतु निर्धारित व्यवस्था।

 (b) पुर्तगाली पुरुषों द्वारा भारतीय स्त्रियों से विवाह करने की नीति।

(c) क्षेत्रीय राजाओं से व्यापारिक लाभ कमाने हेतु अपनायी गई रणनीति।  

 (d) सामुद्रिक मार्गों पर सुरक्षा कर वसूलने की पद्धति।

उत्तर: (d)  

 

सरंजामी/बिबाड़/वार्ना पैक्ट

सरंजामी - पेशवा बालाजी विश्वनाथ (1713-1720 ई.) ने छत्रपति शाहू की सैन्य एवं प्रशासनिक व्यवस्था को पुनर्स्थापित किया। इसी क्रम में उसने कुछ स्वराज क्षेत्र को जागीर में बदल दिया, जिसे सरंजामी कहा जाता था।

बिबाड़ -  यह प्रकार का कर था, जिसे मुगल गवर्नर सरबुलंद खाँ ने लगाया था। यह कभी-कभी सिपाहियों को वेतन देने एवं झगड़ा समाप्त करने के लिए वसूला जाता था।

वार्ना पैक्ट - 1731 ई. में बाजीराव प्रथम ने कोल्हापुर के शंभा जी द्वितीय को पराजित कर उसके साथ वार्ना पैक्ट किया। इसके अनुसार शंभा जी द्वितीय ने शाहू की अधीनता स्वीकार कर ली।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?

1- सरंजामी  - मराठा प्रशासन में जागीर में तब्दील भूमि

2- बिबाड़  - एक प्रकार का कर

3- वार्ना पैक्ट  - बाजीराव द्वितीय एवं शंभा जी द्वितीय के मध्य संधि।

कूटः

(a) 1 और 2    (b) केवल 3  

(c) 1, 2 और 3   (d) उपर्युक्त में से कोई नहीं।

उत्तर: (b)  

 

चौथ एवं सरदेशमुखी

मराठा प्रशासन के अंतर्गत चौथ एवं सरदेशमुखी मराठा राज्य की पूरक आय के रूप में आरोपित कर होते थे जिन्हें शिवाजी द्वारा प्रारंभ किया गया था। किंतु शिवाजी से पूर्व भी गुजरात एवं महाराष्ट्र क्षेत्र में चौथ का प्रचलन था। वस्तुतः चौथ किसी क्षेत्र विशेष के कुल राजस्व का 25 प्रतिशत होता था। इसके साथ ही उस क्षेत्र को सुरक्षा की गारंटी भी दी जाती थी। चौथ से प्राप्त राशि का विभिन्न मराठा सरदारों, पेशवा एवं छत्रपति आदि के मध्य विभाजन होता था। कुल चौथ का 25 प्रतिशत छत्रपति को मिलता था, जो बाबती कहलाता था, 6 प्रतिशत पंत सचिव को सहोतरा के रूप में एवं 3 प्रतिशत छत्रपति के विवेक पर छोड़ दिया जाता था। इसे नादगोंदा कहा जाता था। शेष 66 प्रतिशत चौथ वसूलने वाले मराठा सरदारों में बाँट दिया जाता था।

सरदेशमुखी कुल राजस्व का 10 प्रतिशत होता था, जो सीधो छत्रपति के पास जाता था। वस्तुतः छत्रपति सभी देशमुखों या मराठा सरदारों के प्रधान के रूप में सरदेशमुखी का दावा करता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: चौथ एवं सरदेशमुखी के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- चौथ में संबंधित राज्य को सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जाती थी।

2- सरदेशमुखी, विभिन्न सरदेशमुखों या जिलाधिकारियों में विभाजित किया जाता था।

3- चौथ के अंतर्गत छत्रपति को प्राप्त भाग बाबती कहलाता था।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य नहीं है/हैं?

(a) 1 और 2    (b) केवल 3

(c) 2 और 3    (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)  

 

बारगीर एवं सिलहदार

मराठा साम्राज्य के सैन्य प्रशासन के अंतर्गत शिवाजी द्वारा एक स्थायी सेना स्थापित की गई। इसमें मुख्य सेना ‘बारगीर’कहलाती थी एवं दूसरे प्रकार की सेना सिलहदार कहलाती थी। सिलहदार सेना की नियुक्ति विभिन्न मराठा सरदारों के अंतर्गत स्वतंत्र रूप से की जाती थी, किंतु जब वे राजकीय सेवा में लिए जाते थे, तो उन्हें निश्चित कार्य के बदले भत्ता एवं मुआवजा दिया जाता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: मराठा प्रशासन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- मराठा प्रशासन में गुप्तचर विभाग का प्रमुख बारगीर कहलाता था।

2- धार्मिक मामलों में छत्रपति के मुख्य परामर्शदाता को सिलहदार कहते थे।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?

(a) केवल 1  (b) केवल 2 (c) 1 और 2 दोनों    (d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (d)

 

मामलतदार/दरखदार/कारकुन

मराठा साम्राज्य के जिला प्रशासन के अंतर्गत मामलतदार पर मण्डल, जिले, सरकार, सूबा इत्यादि का भार होता था, जो पेशवा का प्रतिनिधि होता था। इसके समकक्ष ही एक अन्य अधिकारी कामविशदार कहलाता था। ये दोनों जिले में सभी प्रकार के कार्य जैसे - दीवानी एवं फ़ौजदारी मामले, औद्योगिक एवं कृषि विकास आदि करते थे। स्थानीय पटेलों की सहायता से मामलतदार ग्रामों में कर का निर्धारण करता था। देशमुख तथा देशपाण्डे अन्य जिलाधिकारी थे, जो मामलतदार पर नियंत्रण रखते थे। इसके अलावा दरखदार नामक अधिकारी इन पर नियंत्रण के रूप में कार्य करता था। यह वंशानुगत एवं स्वतंत्र अधिकारी होता था। प्रत्येक जिले में एक कारकुन नामक अधिकारी भी होता था, जो विशेष घटनाओं की सूचना सीधे केन्द्र को देता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q. निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?

1-  मामलतदार  - जिले का प्रमुख

2-  दरखदार  - वन विभाग का प्रमुख

3-  कारकुन  - स्थानीय शिल्पकार

कूटः

(a) केवल 1  (b) 1 और 3 (c) 2 और 3  (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)  

 

स्थायी बंदोबस्त

लॉर्ड कार्नवालिस ने 1793 ई. में  भू-राजस्व की स्थायी बंदोबस्त पद्धति को लागू किया। इसे जमींदारी व्यवस्था या इस्तमरारी व्यवस्था भी कहते हैं। इसके अंतर्गत अपनाई गई नीतियाँ इस प्रकार हैं-

• जमींदारों एवं मध्यस्थों को भूमि का स्वामी बना दिया गया।

• अब जमीन की खरीद-बिक्री हो सकती थी।

• भूमि पर रैय्यतों के परंपरागत अधिकार समाप्त हो गए। जैसे- चारागाह, नदी, जंगल आदि।

• भू-राजस्व में सरकार का हिस्सा 10/11 एवं जमींदारों का 1/11 होता था।

• यह व्यवस्था कुल ब्रिटिश भारत के 19 प्रतिशत भाग में लागू की गई जिसमें बंगाल, बिहार, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश का बनारस डिवीजन, उत्तरी कर्नाटक शामिल थे।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: स्थायी बंदोबस्त के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1.  इसमें भूमि को विक्रय योग्य बना दिया गया।

2.  चारागाह, नदी, जंगल आदि सार्वजनिक भूमि पर किसानों के अधिकार समाप्त हो गए।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?

(a) केवल 1  (b) केवल 2 (c) 1 और 2 दोनों    (d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (c)

 

पायबाकी/नानकार/पाहीकाश्त

मुगल साम्राज्य के अंतर्गत सैन्य एवं प्रशासनिक ढाँचे को सुदृढ़ करने के लिए मनसबदारी व्यवस्था का प्रारंभ किया गया था। इन मनसबदारों को उनकी सेवा के बदले वेतन या जागीर के रूप में भुगतान किया जाता था। मनसबदारों को जागीर के रूप में दिए जाने वाले क्षेत्र को ‘पायबाकी’ कहा जाता था।

भू-राजस्व वसूली के पदानुक्रम में सबसे नीचे मालगुजार या छोटे जमींदार होते थे, जिनका भूमि पर स्वतंत्र अधिकार होता था, साथ ही ये किसानों से मालगुजारी भी वसूल करते थे। इसके बदले में वे मालगुजारी या राजस्व मुक्त भूमि पाते थे जिसे नानकार कहा जाता था। जमींदारों के नीचे किसान थे। इन किसानों में घुमक्कड़ किसानों को पाहीकाश्त कहा जाता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?

1-  पायबाकी - मनसबदारों को प्राप्त जागीर क्षेत्र

2-  नानकार - घुमक्कड़ किसान

3- पाहीकाश्त - घुड़सवार सैनिक

कूट

(a) केवल 1  (b) 2 और 3 (c) केवल 3  (d) 1 और 2

उत्तर: (a)

 

आमिल/मिरासिदार/सरंजाम

मुगलकाल के दौरान राजस्व वसूल करने वाले अधिकारी को आमिल कहा जाता था। इसी कालखण्ड में मराठा साम्राज्य के अंतर्गत प्रशासनिक संरचना में सबसे निचले स्तर पर वतन या जागीर के अधिकार विरासत में या वंशानुगत रूप से जिन गाँव के मुखियाओं को प्राप्त होते थे, वे मिरासिदार कहलाते थे। इन मिरासिदारों की क्षेत्रीय सभाएँ राजनीतिक सत्ता की तरह व्यवहार करती थीं। इन्हें संतुलित करने के लिए मराठा राज्य ने अपने संरक्षित क्षेत्र में भूमि संबंधी अस्थायी एवं हस्तांतरणीय अधिकार बाँटे, जिन्हें सरंजाम कहा जाता था। ये मुगलों की जागीरदारी व्यवस्था के समान थे।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: निम्नलिखित को सुमेलित कीजिए-

1-  आमिल  - राजस्व अधिकारी

2-  मिरासिदार  - वंशानुगत ग्रामीण मुखिया

3- सरंजाम   - प्रशिक्षित पैदल सेना

उपर्युक्त में से कौन-सा/से सही सुमेलित नहीं है/हैं?

(a) 1 और 2  (b) केवल 3 (c) 1, 2 और 3   (d) केवल 1

उत्तर: (b)

 

रैय्यतवाड़ी व्यवस्था

ब्रिटिश काल में भारत में लागू की गई भू-राजस्व की स्थायी बंदोबस्त प्रणाली से सरकार को हानि हो रही थी। अब सरकार एक ऐसी व्यवस्था के पक्ष में थी जिसका समय-समय पर पुनर्निर्धारण किया जा सके। इसी क्रम में 1792 में रैय्यतवाड़ी व्यवस्था को सर्वप्रथम बारामहल जिले में कैप्टन रीड द्वारा लागू किया गया। इसमें लगान समझौता जमींदारों से न करके वास्तविक किसानों से किया गया जो भूमि के स्वामी थे। आगे मुनरो एवं एल्फि़ंस्टन ने इस व्यवस्था को क्रमशः मद्रास व बंबई प्रांत में लागू किया। यह ब्रिटिश भारत के कुल भू-भाग के 51% भाग पर लागू की गई। इसके अनुसार प्रत्येक पंजीकृत रैय्यत (किसान) को भू-स्वामी स्वीकार किया गया। ये किसान राज्य सरकार को भू-राजस्व देने के लिए उत्तरदायी थे। वे अपनी भूमि से उस समय तक वंचित नहीं किए जा सकते थे जब तक वे समय पर लगान देते रहें।

संभावित प्रश्न  

Q. रैय्यतवाड़ी व्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1-  इसे हॉल्ट मैकेंजी द्वारा उत्तर-पश्चिमी प्रांत तथा पंजाब में लागू किया गया।

2-  इसमें भू-राजस्व संबंधी समझौता समस्त गाँव के साथ किया जाता था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही नहीं है/हैं?

(a) केवल 1  (b) केवल 2  

(c) 1 और 2 दोनों    (d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (d)

 

महालवाड़ी पद्धति

इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार को निवेश के लिए अत्यधिक धन की आवश्यकता थी जिसे बढ़े हुए राजस्व द्वारा पूरा किया जाना था। महालवाड़ी व्यवस्था इसी आवश्यकता से प्रेरित थी। हॉल्ट मैकेंजी ने इस व्यवस्था को 1822 के रेग्यूलेशन vii के माध्यम से लागू किया। इसके तहत भू-राजस्व संबंधी समझौता संपूर्ण गाँव या महाल के साथ किया जाता था। गाँव या महाल के लोग सम्मिलित रूप से भू-राजस्व देने के लिए उत्तरदायी होते थे। यद्यपि व्यक्तिगत उत्तरदायित्व भी होता था। यदि कोई व्यक्ति अपनी भूमि छोड़ देता था, तो ग्राम समुदाय उसे संभाल लेता था। यह ग्राम समुदाय ही सम्मिलित भूमि तथा अन्य भूमि का स्वामी होता था।

इसमें भू-राजस्व की दर अस्थायी थी। जहाँ जमींदार भू-राजस्व एकत्र करते थे वहाँ भू-राजस्व कुल उपज का 30 प्रतिशत रखा गया, किंतु जहाँ जमींदार नहीं थे, वहाँ इसे बढ़ाकर 95 प्रतिशत तक कर दिया गया। यह व्यवस्था मध्य प्रांत, उत्तर-पश्चिमी प्रांत तथा पंजाब में लागू की गई जो कुल ब्रिटिश भू-भाग का 30 प्रतिशत भू-भाग था।

संभावित प्रश्न  

Q.: महालवाड़ी व्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।

1-  यह व्यवस्था गवर्नर जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स के काल में लागू की गई।

2-  यह कुल ब्रिटिश भू-भाग के 51 प्रतिशत भाग पर लागू की गई।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

(a) केवल 1  (b) केवल 2  

(c) 1 और 2 दोनों    (d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (a)

 

सहायक संधि प्रणाली

लॉर्ड वेलेजली ने भारतीय राज्यों को अंग्रेजी राजनीतिक परिधि में लाने के लिए सहायक संधि प्रणाली का प्रयोग किया। वेलेजली ने सहायक संधि प्रणाली का आविष्कार नहीं किया। इसका अस्तित्व तो पहले से ही था। इसका आधार डूप्ले ने तैयार किया था। 1765 ई- में क्लाइव द्वारा अवधा के साथ हुई  संधि में भी सहायक संधि के कुछ तत्व मिलते हैं। आगे वेलेजली ने इसे सैद्धांतिक आधार देते हुए सहायक संधि नाम दिया जिसके प्रावधान थे- जिस राज्य से संधि की जाती थी, वहाँ ब्रिटिश रेजीडेंट रखना पड़ेगा जो राज्य को आंतरिक अशांति एवं बाह्य आक्रमण के समय मदद् प्रदान करेगा। इसके बदले में बड़े राज्य को अपने क्षेत्र का एक भू-भाग और छोटे राज्य को नकद धन देना पड़ता था। कंपनी, राज्य के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी तथा राज्य की विदेश नीति कंपनी के अधीन होगी। ब्रिटिश की मर्जी के बिना राज्य किसी यूरोपीय व्यक्ति को सेवा में नहीं रख सकता था। सबसे पहले सहायक संधि करने वाले राज्य क्रमशः हैदराबाद, मैसूर व तंजौर, अवध, पेशवा, भोंसले तथा सिंधिया थे।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: सहायक संधि प्रणाली के अंतर्गत कौन-सा/से प्रावधान शामिल था/थे?

1-  कंपनी, राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी।

2-  भारतीय राजाओं के विदेशी संबंध कंपनी के अधीन होंगे।

3- संधि करने वाले राज्य को गोद लेने का कोई अधिकार नहीं होगा।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

(a) केवल 1  (b) 1 और 2  

(c) 2 और 3    (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

 

व्यपगत सिद्धांत

लॉर्ड डलहौजी द्वारा भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के प्रसार का लक्ष्य घोषित किया गया। इसी उद्देश्य से उसने भारत में शांतिपूर्ण विलय की नीति के तहत व्यपगत सिद्धांत को लागू किया। हालांकि मूल रूप से इस सिद्धांत का प्रतिपादन 1834 ई. में कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर ने किया था और कहा था कि अधीनस्थ राज्यों को गोद लेने का कोई अधिकार नहीं है। डलहौजी द्वारा व्यपगत सिद्धांत के अनुसार राज्यों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया था-

1- स्वतंत्र एवं मित्र  राज्य - इन राज्यों को अपने उत्तराधिकारी के लिए ब्रिटिश से अनुमति लेना आवश्यक नहीं था।

2- वे राज्य, जो पहले मुगल या मराठों के अधीन थे किंतु अब ब्रिटिश के अधीन हो गए थे- इन राज्यों को गोद लेने के लिए अनुमति लेना आवश्यक था।

3- स्वतंत्र रूप से ब्रिटिश सनदों द्वारा स्थापित राज्य - इन राज्यों को गोद लेने का अधिकार नहीं था।

इस सिद्धांत के अनुसार विलय किए गए राज्य थे- सतारा (1848), जैतपुर और संभलपुर (1849), बघाट (1850), उदयपुर (1852), झाँसी (1853) और नागपुर (1854)।

संभावित प्रश्न

Q.: लॉर्ड डलहौजी द्वारा व्यपगत सिद्धांत के तहत विलय किए गए राज्यों को सही कालानुक्रम में व्यवस्थित कीजिए।

1-  झाँसी 2-  बघाट

3- उदयपुर 4-  सतारा

कूटः  

(a) 2-3-4-1  (b) 4-1-2-3

(c) 4-3-2-1    (d) 4-2-3-1

उत्तर: (d)

 

पिण्डारी

‘पिण्डारी’ शब्द की उत्पत्ति मराठी भाषा से हुई है। दरअसल, पिण्ड एक प्रकार की आसव (खमीरा) शराब थी तथा उसको पीने वाले लोग ‘पिण्डारी’ कहलाते थे। 18वीं एवं 19वीं शताब्दियों में ये लोग केवल लूटमार ही करते थे। इनका पहला उल्लेख 1689 में मुगलों द्वारा महाराष्ट्र पर आक्रमण के समय हुआ। बाजीराव प्रथम के काल से ये मराठों की ओर से अवैतनिक रूप में लड़ते थे और केवल लूट में भाग लेते थे। पानीपत के युद्ध के बाद ये मालवा क्षेत्र में बस गए तथा सिंधिया, होल्कर व निजाम के सहायक सैनिक बन गए। अब ये सिंधिया शाही, होल्कर शाही व निजाम शाही पिण्डारी कहलाने लगे। मैल्कम ने इन्हें ‘मराठा शिकारियों के साथ शिकारी कुत्तों’ की उपमा दी थी। इनका कोई धर्म विशेष व जाति नहीं थी। ये लोग गुप्त रूप से कार्य करते थे। इनके प्रमुख नेता चीतू, वासिल मुहम्मद तथा करीम खाँ थे। लॉर्ड हेस्टिंग्स (1813-1823) के काल में पिंडारियों का दमन किया गया था। इस दौरान उत्तरी सेना की कमान स्वयं हेस्टिंग्स ने संभाली तथा दक्षिणी सेना की कमान सर टॉमस हिसलोप को दे दी।

संभावित प्रश्न

Q.: ‘पिण्डारियों’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1-  ये अवैतनिक रूप से राजपूतों को सैन्य सहायता प्रदान करते थे।

 2-  इनके दल में हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ही शामिल थे।

3- लॉर्ड हेस्टिंग्स के काल में इनका दमन कर दिया गया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) 1 और 3  (b) 2 और 3

(c) केवल 1    (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

 

कृषि का व्यावसायीकरण

कृषि के व्यावसायीकरण से तात्पर्य है परम्परागत फ़सलों के बदले नकदी फ़सलों के उत्पादन को प्रोत्साहन देना। आम तौर पर व्यावसायीकरण कृषि अर्थव्यवस्था के पूँजीवादी रूपान्तरण को प्रोत्साहन देता है परन्तु औपनिवेशिक शासन के तहत लाए गए व्यावसायीकरण ने भारत में भुखमरी तथा दरिद्रीकरण को प्रोत्साहित किया क्योंकि कृषि के व्यावसायीकरण की प्रक्रिया में ब्रिटिश कंपनी ने उन्हीं फ़सलों के उत्पादन को प्रोत्साहन दिया जो स्वयं उनकी आवश्यकता के अनुकूल थीं। साथ ही किसानों को व्यावसायिक फ़सलों को जबरन अपनाना पड़ा क्योंकि भू-राजस्व की प्रचलित दर को वे परम्परागत फ़सलों के उत्पादन द्वारा पूरा नहीं कर सकते थे। कृषि के व्यावसायीकरण के पीछे अंग्रेजों के उद्देश्य थे- भू-राजस्व की बढ़ी हुई राशि को आसानी से प्राप्त करना, ब्रिटेन के लिए कच्चे माल की उपलब्धाता सुनिश्चित करना एवं भारत से ब्रिटेन के लिए अनाजों के निर्यात को सुलभ बनाना। इसके दुष्परिणाम यह हुए कि नकदी फ़सलों के उत्पादन से खाद्यान्न फ़सलों में गिरावट आई जिससे अकाल व भुखमरी बढ़ी, साथ ही ग्रामीण ऋणग्रस्तता बढ़ी। व्यावसायीकरण के बावजूद कृषि का आधुनिकीकरण नहीं किया गया, परिणामस्वरूप किसानों का अत्यधिक शोषण हुआ।

 

संभावित प्रश्न

Q.: भारत में कृषि के व्यावसायीकरण के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1-  कृषि के व्यावसायीकरण से भारत में कृषि का आधुनिकीकरण संभव हुआ।

2-  इससे कृषि का पूँजीवादी रूपांतरण हुआ।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

(a) केवल 1  (b) केवल 2  

(c) 1 और 2 दोनों    (d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (b)

 

ब्रह्म समाज

भारतीय पुनर्जागरण के जनक एवं आधुनिक भारत के निर्माता राजा राममोहन राय ने सामाजिक सुधार के उद्देश्य से अगस्त, 1828 में ब्रह्म सभा का गठन किया जो आगे चलकर ब्रह्म समाज कहलाया। इसका प्रमुख उद्देश्य हिन्दू धर्म का शुद्धीकरण एवं एकेश्वरवाद या निर्गुण परमात्मा में विश्वास था। राजा राममोहन राय के ये उद्देश्य वेदों तथा उपनिषदों की शिक्षा पर आधारित थे। वे मूर्तिपूजा, जाति प्रथा, सामाजिक कुरीतियों के कट्टर विरोधी थे। ब्रह्म समाज सर्व-धर्म समभाव एवं अहिंसा पर बल देता था।

 

संभावित प्रश्न

Q.: ब्रह्म समाज के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।

1- इसकी स्थापना 1828 में राजा राममोहन राय ने की।

2- इसका प्रमुख उद्देश्य हिंदू धर्म का शुद्धीकरण एवं बहुदेववाद में विश्वास था।

3- यह मूर्तिपूजा का प्रबल समर्थक था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

(a) 1 और 2  (b) केवल 1 (c) 2 और 3     (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)

 

आदि ब्रह्म समाज एवं भारतीय ब्रह्म समाज

राजा राममोहन राय की मृत्यु के बाद ब्रह्म समाज का कार्यभार रविन्द्रनाथ टैगोर के पिता देवेंद्रनाथ टैगोर ने 1842 में संभाला। उन्होंने ब्रह्म समाज को नयी चेतना एवं नया स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने तत्वबोधिानी एवं ज्ञानवर्धिनी सभा के माध्यम से भारतीय प्राचीन सभ्यता एवं राजा राममोहन राय के विचारों का प्रसार किया। आगे 1858 में केशवचंद्र सेन ने ब्रह्म समाज की सदस्यता ग्रहण की। उनकी ऊर्जा, वाकपटुता और उदारवादी विचारों ने ब्रह्म समाज को लोकप्रिय बना दिया, परन्तु शीघ्र ही उदारवाद के कारण ब्रह्म समाज में फ़ूट पड़ गई। वे हिन्दू धर्म को संकीर्ण मानते थे तथा समाज के अंतर्राष्ट्रीयकरण, समाज में सभी धर्मों की शिक्षा आदि मुद्दों पर बल देते थे जिसके कारण देवेंद्रनाथ टैगोर से उनके मतभेद गहरे हो गए। 1865 में सेन को आचार्य की पदवी से बर्खास्त कर दिया गया। 1866 में उन्होंने ‘भारतीय ब्रह्म समाज’ के नाम से एक नई सभा का गठन किया। इसके बाद देवेन्द्रनाथ टैगोर के ब्रह्म समाज को ‘आदि ब्रह्म समाज’ के नाम से जाना जाने लगा।

 

संभावित प्रश्न

Q.: निम्नलिखित में से किसके द्वारा भारतीय ब्रह्म समाज की स्थापना की गई?

(a) देवेंद्रनाथ टैगोर   (b) ईश्वरचंद्र विद्यासागर

(c) केशवचंद्र सेन    (d) ताराचंद्र चक्रवर्ती

उत्तर: (c)

 

प्रार्थना समाज

ब्रह्म समाज की विचारधारा महाराष्ट्र में भी फ़ैली। यहाँ 1849 में एक परमहंस सभा की स्थापना की गई जो एक गुप्त धार्मिक संस्था थी। 1860 में इसका विघटन होने के बाद 1867 में आत्माराम पांडुरंग ने केशवचंद्र सेन की सहायता से प्रार्थना समाज की स्थापना की जिसमें महादेव गोविंद रानाडे, आर. जी. भण्डारकर, एन. जी. चंद्रावरकर जैसे अनेक महत्वपूर्ण व्यक्ति शामिल थे। ब्रह्म समाज के समान यह एक बौद्धिक एकतावादी संगठन था जिसमें सामाजिक सुधारों पर अधिक बल दिया गया। इसके चार प्रमुख उद्देश्य थे-  

(1) जाति व्यवस्था का विरोध, (2) लड़के और लड़की दोनों की विवाह की आयु में वृद्धि करना (3) विधवा पुनर्विवाह को बढ़ावा देना और (4) स्त्री शिक्षा को प्रोत्साहन। एम. जी. रानाडे ने धोंडो केशव करुए के साथ मिलकर विधवा पुनर्विवाह आंदोलन और विधवा होम एसोसिएशन की नींव रखी।

 

संभावित प्रश्न

Q.: प्रार्थना समाज के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- इसकी स्थापना महाराष्ट्र में ज्योतिबा फ़ुले द्वारा 1867 में की गई थी।

2- एम- जी- रानाडे और आर- जी- भण्डारकर इससे संबद्ध थे।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1    (b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों      (d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (b)

 

सत्यशोधक समाज

महाराष्ट्र में ज्योतिराव गोविन्द राव ने निम्न जातियों के लिए संघर्ष किया। माली कुल में जन्म लेने के कारण उन्हें फ़ुले कहा जाने लगा। उन्होंने 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की जिसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक सेवा एवं स्त्रियों तथा निम्न जाति के लोगों के बीच शिक्षा का प्रचार करना था। ज्योतिबा फ़ुले ने ब्राह्मण विरोधी एवं गुलामगिरी के विरुद्ध कार्य किया तथा गुलामगिरी नामक पुस्तक भी लिखी। उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री बाई की सहायता से पुणे में एक बालिका स्कूल की भी स्थापना की। उनके अन्य प्रकाशनों में धर्म तृतीय रत्न तथा शिवाजी की जीवनी प्रमुख हैं। 1888 ई. से लोग इन्हें महात्मा कहने लगे।

 

संभावित प्रश्न

Q.: सत्यशोधक समाज के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- इसकी स्थापना डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा की गई थी।

2- यह एक ब्राह्मण विरोधी आंदोलन था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 (b) केवल 2 (c) 1 और 2 दोनों (d)  न तो 1, न ही 2

उत्तर: (b)

 

 

आर्य समाज

आर्य समाज की स्थापना 1875 ई. में दयानंद सरस्वती द्वारा की गई थी। यह एक सुधारवादी आंदोलन था जिसका उद्देश्य प्राचीन वैदिक धर्म की शुद्ध रूप से पुनः स्थापना करना था। दयानंद सरस्वती ने वेदों को सच्चा और सभी धर्मों से हटकर बताते हुए ‘वेदों की ओर लौटो’ का नारा दिया। उन्होंने प्राचीन हिंदू धर्म ग्रंथों में पुराणों की आलोचना की। उनकी दृष्टि परंपरावादी नहीं थी। उन्होंने वेदों की व्याख्या आधुनिक संदर्भों में करते हुए बाल विवाह, मूर्तिपूजा, पुरोहितवाद, कर्मकांड, विधवा व्यवस्था, सती प्रथा व पर्दा प्रथा का विरोध किया तथा अंतर्जातीय विवाह, विधवा विवाह का समर्थन किया। हिंदू धर्म की रक्षा के लिए शुद्धि आंदोलन भी चलाया। उनके विचार एवं चिंतन का प्रकाशन उनकी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में किया गया है।

 

संभावित प्रश्न

Q.: आर्य समाज के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- इसकी स्थापना 1875 ई. में दयानंद सरस्वती द्वारा की गई थी।

2- इसके द्वारा अंतर्जातीय विवाह एवं मूर्तिपूजा का समर्थन किया गया।

3- इसके द्वारा वैदिक काल की पुनर्स्थापना की व्याख्या की गई।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1   (b) 2 और 3  

(c) 1 और 3   (d)  1, 2 और 3

उत्तर: (a)

 

सेवा सदन

भारतीय समाज सुधारक बहरामजी मालाबारी ने 1908 में अपने मित्र दयाराम गिडूमल के साथ मिलकर सेवा सदन नामक संस्था की स्थापना की। इसके माध्यम से उन्होंने बाल विवाह का विरोध एवं विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। एम. मालाबारी के प्रयासों से ही ऐज ऑफ़ कंसेंट एक्ट पारित किया गया जिसमें 12 वर्ष से कम आयु की लड़की के विवाह को निषेध किया गया। सेवा सदन के माध्यम से शोषित एवं समाज से तिरस्कृत महिलाओं का उत्थान किया गया। साथ ही महिलाओं के लिए शिक्षा एवं चिकित्सा सुविधाओं को सुनिश्चित किया गया।

 

संभावित प्रश्न

Q.: बहरामजी मालाबारी के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।

1- इन्होंने 1908 में सेवा सदन नामक संस्था का गठन किया।

2- ऐज ऑफ़ कंसेंट एक्ट इन्हीं के प्रयासों का परिणाम था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 (b) केवल 2 (c) 1 और 2 दोनों (d)  न तो 1, न ही 2

उत्तर: (b)

 

राधास्वामी आंदोलन

राधास्वामी आंदोलन एक सामाजिक-सुधार आंदोलन था। इसकी शुरुआत 1861 ई. में शिव दयाल साहब ने की थी, इन्हें तुलसीराम के नाम से भी जाना जाता था। यह आंदोलन एकेश्वरवाद, गुरु की सर्वोच्चता, सत्संगों का आयोजन एवं सादगीपूर्ण जीवन पर बल देता था एवं सांसारिक मोहमाया से दूर रहने की बात करता था। साथ ही यह सभी धर्मों को समान मानता था। इसके अनुयायियों का दरगाह एवं धार्मिक स्थलों में जाने में विश्वास नहीं था। इसके स्थान पर वे सेवा एवं प्रार्थना को अधिक महत्व देते थे।

 

संभावित प्रश्न

Q.: राधास्वामी आंदोलन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- इसका प्रारंभ राधाकांत देव द्वारा किया गया।

2- यह एक ही ईश्वर की सर्वोच्चता में विश्वास करता था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 (b) केवल 2 (c) 1 और 2 दोनों (d)  न तो 1, न ही 2

उत्तर: (b)

 

आत्म-सम्मान आंदोलन

सामाजिक सुधार आंदोलन के रूप में आत्म-सम्मान आंदोलन का प्रारंभ 1925 में ई. वी. रामास्वामी नायकर ‘पेरियार’ एवं बालीजा नायडू द्वारा किया गया था। इसका उद्देश्य ब्राह्मणवाद का विरोध करते हुए निम्न जाति के लोगों के अधिकारों की मांग करना एवं उनका प्रतिनिधित्व करना था। इस आंदोलन में ब्राह्मण पुरोहितों के बिना विवाह करवाने, मंदिरों में बलात् प्रवेश, मनुस्मृति को जलाने जैसे कार्यक्रम शामिल थे। हालांकि इसकी सीमा यह रही कि इसका सामाजिक आधार उच्च गैर-ब्राह्मण जातियों तक ही सीमित था।

 

संभावित प्रश्न

Q.: ‘आत्म-सम्मान आंदोलन’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- इसकी शुरुआत डॉ- भीमराव अंबेडकर द्वारा की गई।।

2- इसमें ब्राह्मणों की सर्वोच्चता को चुनौती दी गई।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1 (b) केवल 2 (c) 1 और 2 दोनों (d)  न तो 1, न ही 2

उत्तर: (b)

 

धर्म सभा

‘धर्म सभा’ नामक समाज-सुधारक संस्था की स्थापना 1830 में राधाकांत देब द्वारा की गई थी। यह एक रूढ़िवादी संस्था थी। इसके माध्यम से पुरातन एवं रूढ़िवादी तत्वों को संरक्षण प्रदान करने की बात कही गई। इसने सती प्रथा को समाप्त किए जाने वाले प्रयासों का विरोध किया, किंतु महिलाओं हेतु आधुनिक शिक्षा का समर्थन किया।

 

संभावित प्रश्न

Q.: ‘धर्म सभा’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- इसकी स्थापना राधाकांत देब द्वारा की गई।

2- यह पुरातन एवं रूढ़िवादी तत्वों के संरक्षण का प्रयास करती थी।

3- इसने सती प्रथा को समाप्त किए जाने वाले प्रयासों का विरोधा किया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) 1 और 3 (b) केवल 1 (c) 2 और 3 (d)  1, 2 और 3

उत्तर: (d)

 

जस्टिस आंदोलन

1917 में मद्रास में सी.एन. मुद्लियार, टी.एम. नायर एवं पी. त्यागराज ने प्रथम गैर-ब्राह्मण सभा गठित की जिसका नाम था -‘दक्षिण भारतीय उदारवादी संघ’। इसी को आगे प्रायः जस्टिस आंदोलन के नाम से जाना जाने लगा। इसका उद्देश्य गैर-ब्राह्मण जातियों का विधायिका में प्रतिनिधित्व बढ़ाना था। इसी क्रम में 1917 में मद्रास प्रेसीडेंसी एसोसिएशन की स्थापना की गई।

 

संभावित प्रश्न

Q.: जस्टिस आंदोलन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए।

1- इसकी शुरुआत 1917 में श्री नारायण गुरु स्वामी ने की।

2- इसका उद्देश्य गैर-ब्राह्मण जातियों का विधायिका में प्रतिनिधित्व बढ़ाना था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1            (b) केवल 2  

(c) 1 और 2 दोनों   (d)  न तो 1, न ही 2

उत्तर: (b)