Aug. 17, 2021

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                   सराय-ए-अदल

 

अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी बाजार नीति के अंतर्गत दिल्ली में बदायूँ द्वार के भीतर कूशके सब्ज (हरा राजमहल) के पास अनाज, कीमती कपड़ों तथा गुलाम-मवेशियों के तीन बाजार बनवाए। इन बाजारों को सराय-ए-अदल कहा गया। इसका शाब्दिक अर्थ न्याय का स्थान होता था। ये सरकारी धन से सहायता प्राप्त बाजार थे।

संभावित प्रश्न  

Q.- मध्यकालीन भारतीय इतिहास में ‘सराय-ए-अदल’ शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?

(a) बाजार व्यवस्था   (b) भूमि पैमाइश

(c) अस्थायी सैनिक   (d) सुल्तान के सैनिक

उत्तर: (a)  

 

शहना/मुनहियन/मुहतसिब/दीवान-ए-रियासत

 

शहना -  अलाउद्दीन खिलजी द्वारा स्थापित बाजार व्यवस्था के अंतर्गत शहना, बाजार का प्रमुख होता था तथा तीनों बाजारों का प्रमुख शहना-ए-मंडी होता था। इसका कार्य सौदागरों का रजिस्टर रखना, दुकानदारों व कीमतों पर नियंत्रण तथा कुछ न्यायिक कार्य करना था।

मुनहियन -  यह जासूस होता था। इसे मुन्ही भी कहते थे। यह घरों में प्रवेश कर गौण अपराधों को भी रोक सकता था।

मुहतसिब -  यह जन साधारण के आचार का रक्षक व देखभाल करने वाला अधिाकारी था। यह भी बाजारों पर नियंत्रण रखता था और नाप-तौल का निरीक्षण करता था।  

दीवान-ए-रियासत - यह वाणिज्य मंत्री होता था, जो बाजार व्यवस्था का सर्वोच्च अधिाकारी था। अलाउद्दीन ने इस नवीन पद का सृजन किया। इसका कार्य व्यापारी वर्ग पर नियंत्रण रखना तथा आर्थिक नियमों को लागू करवाना था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.- सुमेलित कीजिए-

A. शहना  1. वाणिज्य मंत्री

B. मुनहियन  2. जनता के आचार की निगरानी करने वाला

C. मुहतसिब  3. जासूस

D. दीवान-ए-रियासत 4. बाजार व्यवस्था से संबद्ध अधिाकारी

कूटः

 A B C D

(a) 4 3 2 1  

(b) 3 4 1 2

(c) 1 2 3 4  

(d) 1 4 3 2

उत्तर: (a)  

 

परवानानवीस

सल्तनत काल में अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल में परवानानवीस नामक अधिकारी व्यापारियों को परमिट (लाइसेन्स) जारी करता था। अलाउद्दीन खिलजी की बाजार व्यवस्था से संबंधित अंतिम अधिनियम इसी की नियुक्ति एवं अधिकारों से संबंधित है। कोई भी वस्त्र, चाहे वह किरपास (सूती वस्त्र) हो या खुज्जे दिल्ली (दिल्ली में बना रेशमी वस्त्र) बिना परवानानवीस की अनुमति के नहीं बेचा जा सकता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: मध्यकालीन भारतीय इतिहास में ‘परवानानवीस’नामक अधिकारी का कार्य था-

(a) 12 प्रांतों एवं सरकारों का प्रमुख।

(b) दरबारी कार्यों का रिकॉर्ड रखना।

(c) व्यापारियों को लाइसेंस जारी करना।  

(d) विदेश नीति से संबद्ध अधिाकारी।

उत्तर: (c) 

 

बर-अबर सिद्धांत

अलाउद्दीन खिलजी की बाजार व्यवस्था बर-अबर सिद्धांत पर आधारित थी, जिसका तात्पर्य प्रगतिशील उत्पादन लागत सिद्धांत से था। इसके 7 नियम थे- (i) सभी वस्तुओं के दाम निश्चित किए गए; (iii) मलिक कबूल उलुग खानी को गल्लामंडी का नियंत्रक (शहना) नियुक्त किया गया; (ii) सरकारी गोदामों में गल्ले का एकत्रण; (iv) गल्ले का परिवहन करने वाले, मलिक कबूल के नियंत्रण में; (v) मुनाफ़ाखोरी निषेध; (vi) सभी अधिकारियों को सूचित किया गया कि वे किसानों द्वारा व्यापारियों को गल्ला नकद मूल्य पर दिलवायें तथा उसे उनके घर न ले जाने दें; (vii) सुल्तान को गल्लामंडी की दैनिक रिपोर्ट शहना-ए-मंडी, बरीद एवं मुन्ही के माध्यम से देना।

 

संभावित प्रश्न  

Q. मध्यकालीन आर्थिक इतिहास में ‘बर-अबर सिद्धांत’किससे संबंधित था?

(a) उत्पादन लागत सिद्धांत  (b) मध्य एशियाई घोड़ों का व्यापार

(c) सैनिकों की नियुक्ति  (d) खालिसा भूमि का निर्धारण

उत्तर: (a)

 

मिल्क/वक्फ़/इद्ररात/मसाहत

अलाउद्दीन खिलजी पहला सुल्तान था, जिसने राजस्व संबंधी नियमों में सुधार किए। उसने मिल्क, वक्फ़ एवं इद्ररात भूमि को जब्त कर खालिसा भूमि में तब्दील कर दिया। वस्तुतः मिल्क, राज्य द्वारा प्रदत्त सम्पत्ति या भूमि थी, वक्फ़, धार्मिक सेवा के आधार पर प्राप्त भूमि थी तथा इद्ररात, पेंशन के रूप में प्राप्त भूमि थी। इसी क्रम में खालिसा भूमि को सुल्तान की भूमि कहते थे जिसका प्रबंधन केन्द्रीय सरकार द्वारा किया जाता था और जिसकी आय राज्य के लिए सुरक्षित होती थी। मसाहत प्रणाली के अंतर्गत अलाउद्दीन खिलजी ने भूमि की पैमाइश कराकर लगान वसूलना प्रारंभ किया। इसमें विस्वा को न्यूनतम इकाई माना गया।

 

संभावित प्रश्न 

Q. मध्यकालीन आर्थिक सुधारों के संदर्भ में कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?

1- मिल्क - भू-राजस्व वसूली

2- वक्फ़ - धार्मिक सेवा हेतु प्राप्त भूमि

3- इद्ररात - पेंशन के रूप में प्राप्त भूमि

4- मसाहत - राज्य द्वारा प्रदत्त भूमि

कूटः

(a) 1, 2 और 4  (b)  2 और 3

(c) 1 और 4   (d) 1, 3 और 4

उत्तर: (b)

 

तौफीर/फ़वाजिल/अब्वाब

सल्तनत काल में इक्तादारी व्यवस्था के तहत इक्ता की अनुमानित आय में वृद्धि को तौफीर  कहा जाता था, जबकि ‘फ़वाजिल’ इक्ता से प्राप्त अतिरिक्त आय थी, जो इक्तादार द्वारा सीधे  केन्द्र को भेज दी जाती थी। ध्यातव्य है कि जलालुद्दीन खिलजी ने अलाउद्दीन खिलजी को फ़वाजिल भेजने से मुक्त कर दिया था।

अब्वाब एक प्रकार का अतिरिक्त कर या उपकर था। फि़रोजशाह तुगलक द्वारा किसानों से अब्वाब की वसूली को प्रतिबंधित कर दिया गया था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: मध्यकालीन भारतीय इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- सल्तनत काल में इक्ता की अनुमानित आय में वृद्धि को फ़वाजिल कहा जाता था।

2- अब्वाब, इक्ता से प्राप्त अतिरिक्त आय थी, जो केन्द्र का हिस्सा होती थी।

3- तौफीर, किसानों से लिया जाने वाला एक प्रकार का उपकर था।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन असत्य है/हैं?

(a) केवल 1 (b) 1 और 2 (c) 2 और 3  (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (d)

 

खराजी भूमि/मदद्-ए-माश भूमि/खिदमती

खराजी भूमि; सल्तनत काल में यह गैर-मुसलमानों के अधिकार में रहने वाली भूमि होती थी। इस भूमि से उपज का 20 प्रतिशत भू-राजस्व वसूला जाता था।

मदद्-ए-माश-सल्तनत काल के दौरान दान के रूप में प्रदान की गई कर मुक्त भूमि मदद्-ए-माश कहलाती थी। अलाद्दीन खिलजी पहला सुल्तान था, जिसने मदद्-ए-माश के रूप में प्रदत्त भूमियों को जब्त कर लिया।

 खिदमती : सल्तनत काल में यह एक प्रकार का कर था जो पराजित भारतीय सरदारों से लिया जाता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: मध्यकालीन इतिहास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- मुगल काल में गैर मुसलमानों के अधिकार में रहने वाली भूमि को खराजी भूमि कहते थे।

2- सर्वप्रथम अलाउद्दीन खिलजी ने मदद्-ए-माश के रूप में प्रदत्त भूमियों को जब्त किया था।

3- खिदमती, सल्तनत काल में पराजित भारतीय सरदारों से वसूला जाने वाला कर था।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य है/हैं?

(a) केवल 1 (b) 2 और 3 (c) केवल 2 (d)  1, 2 और 3

उत्तर: (d)

 

खुम्स या माल-ए-गनीमह

सल्तनत काल में लूटे हुए धन, खानों अथवा भूमि में गढ़े हुए धन से प्राप्त सम्पत्ति को ‘खुम्स’ कहते थे। इस लूटे हुए धान या खुम्स के 1/5 भाग पर सुल्तान का तथा 4/5 भाग पर सैनिकों का अधिकार होता था। अलाउद्दीन खिलजी एवं मुहम्मद बिन तुगलक ने इसके विपरीत अर्थात् कुल लूटे हुए धन के 4/5 भाग पर अपना अधिकार घोषित किया तथा सैनिकों को 1/5 भाग प्रदान किया। आगे चलकर फि़रोजशाह तुगलक द्वारा इसे वापस पूर्व स्थिति में लिया जाने लगा।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: सल्नतकाल में ‘खुम्स’ शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?

(a) अस्तबल का संरक्षक  (b) लूटा हुआ धा

(c) आयात-निर्यात कर    (d) सेना का गुप्तचर

उत्तर: (b)

 

उलुक एवं ढावा

सल्तनत काल में डाक व्यवस्था को सुदृढ़ करने का श्रेय ग्यासुद्दीन तुगलक को दिया जाता है। वस्तुतः उलुक एवं ढावा सल्तनतकालीन डाक व्यवस्था के दो प्रकार थे। उलुक, अश्व डाक व्यवस्था थी, जिसे प्रत्येक 4 मील की दूरी पर स्थापित किया जाता था, जबकि ढावा या दावाह, पैदल डाक व्यवस्था थी, जो प्रत्येक 3 मील की दूरी पर स्थापित थी। यह अश्व डाक व्यवस्था से तेज थी। ध्यातव्य है कि इसी डाक व्यवस्था से मुहम्मद-बिन-तुगलक को दौलताबाद में पीने के लिए गंगाजल उपलब्ध कराया जाता था। इसके अलावा, साधारण जनता को निजी डाक भेजने के लिए पट्टामार व्यवस्था अलग से उपलब्ध थी।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: सल्तनतकाल में उलुक एवं ढावा क्या थे?

(a) सिक्के    (b) डाक व्यवस्था के प्रकार  

(c) भू-पैमाइश उपकरण    (d) सूती वस्त्र के प्रकार

उत्तर: (b)

 

मल्ल एवं मक्ता

सल्तनतकालीन संगीत के अंतर्गत मल्ल एवं मक्ता, गज़ल में गाए जाने वाले सेर हैं। वस्तुतः गज़ल अरबी भाषा का शब्द है, जिसका तात्पर्य है - प्रेम पात्र (स्त्री) से वार्तालाप करना। एक गज़ल में न्यूनतम 5 और अधिकतम 11 सेर होते हैं। गज़ल का पहला सेर मल्ल और अंतिम सेर मक्ता कहलाता है। गज़ल के संग्रह को दीवान कहते हैं। ध्यातव्य है कि चिश्ती सिलसिले के अनुयायी खुदा की इबादत गज़ल के रूप में करते थे, इसलिए गज़ल को चिश्तियों का रहस्यवाद भी कहा गया है।

संभावित प्रश्न 

Q.: मध्यकालीन इतिहास में मल्ल एवं मक्ता का संबंध किससे है?

(a) भूमि मापक यंत्र से  

(b) गज़ल से

(c) शिला प्रक्षेपास्त्र  

(d) ग्राम राजस्व अधिकारियों से

उत्तर: (b)

 

अरबस्क/स्क्रीच/कुफ्री शैली

सल्तनतकालीन स्थापत्य के क्षेत्र  में तुर्कों के द्वारा अरबस्क, स्क्रीच तथा कुफ्री शैली का प्रारंभ किया गया। वस्तुतः चौकोर कोने को गोलाकार बनाने के लिए स्क्रीच शैली का प्रयोग किया जाता था। भवनों एवं इमारतों की सजावट के लिए फ़ूलों एवं ज्यामितीय आकृतियों का इस्तेमाल किया गया, साथ ही उनकी दीवारों पर कुरान की आयतें खुदवाई गईं। इस प्रकार अरबी लिपि स्वयं ही एक कलाकृति के रूप में उभरकर आई। इसे कुफ्री शैली कहा गया तथा सजावट की इन शैलियों को सम्मिलित रूप से अरबस्क शैली कहा गया। इसके अलावा, तुर्कों द्वारा स्थापत्य में घंटी, स्वास्तिक, कमल आदि हिंदू प्रतीकों का भी प्रयोग किया गया।

संभावित प्रश्न  

Q.: सल्तनतकालीन सांस्कृतिक इतिहास में अरबस्क, स्क्रीच एवं कुफ्री शैलियाँ किससे संबंधिात थीं?

(a) स्थापत्य निर्माण   (b) चित्रकला की क्षेत्रीय शैलियाँ

(c) वस्त्र निर्माण   (d) सिक्कों का निर्माण  

उत्तर: (a)

 

तुमान एवं युजबाशी

मध्यकाल में चंगेज खाँ ने सबसे पहले मंगोल सेना को दशमलव पद्धति के आधार पर संगठित किया। इसमें 10,000 सैनिकों की टुकड़ी तुमान कहलाती थी जो सबसे बड़ी इकाई होती थी, इस टुकड़ी का प्रमुख ‘खान’ कहलाता था। सबसे छोटी टुकड़ी 10 सैनिकों की होती थी। इसके अलावा, 100 सैनिकों की टुकड़ी के प्रमुख को युजबाशी कहते थे। मंगोलों की इस सैन्य पद्धति को आगे अलाउद्दीन खिलजी, मुहम्मद बिन तुगलक एवं बादशाह अकबर ने भी अपनाया।

संभावित प्रश्न  

Q.: मध्यकालीन इतिहास में तुमान एवं युजबाशी क्या थे/थीं?

(a) मंगोल सेना में प्रदत्त सैन्य पद।

(b) सल्तनतकालीन शिक्षा पद्धतियाँ।

(c) तुगलक स्थापत्य की विशिष्ट तकनीकी।  

(d) सिंचाई के साधान।

उत्तर: (a)

 

तबकात/सीरत/मगाजी/मनाकिब

मध्यकाल में इतिहास लेखन में काफ़ी प्रगति देखी गई। इसी क्रम में मुस्लिम इतिहासकारों द्वारा इस्लाम के गौरव को स्थापित करने के उद्देश्य से इतिहास लेखन प्रारंभ किया गया। अरबी लेखकों द्वारा वंशावलियों से संबंधित अन्साब, हजरत मुहम्मद के जीवन वृत्तान्त से संबंधित सीरत, युद्धों के वृत्तान्त से संबंधित मगाजी तथा सामान्य इतिहास के ग्रंथों से संबंधित तबकात लिखने की परंपरा शुरू की गई। आगे चलकर फ़ारसी लेखकों ने इतिहास लेखन को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया। नैतिक आचार संहिताओं एवं शिष्टाचार से संबंधित अखलाक साहित्य लिखा जाने लगा। जैसे- अखलाक-ए-नासिरी आदि। मध्यकाल में शासकों के लिए लिखे गए प्रशस्ति काव्यों के लिए ‘मनाकिब’ एवं ‘फ़जायल’ शब्द प्रयुक्त किए जाते थे। जैसे-बदरुद्दीन की शाहनामा आदि।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: मध्यकालीन इतिहास लेखन के संदर्भ में निम्नलिखित को सुमेलित कीजिए-

 सूची-I  सूची-II

A. तबकात 1- प्रशस्ति काव्य

B. सीरत 2- युद्धों के वृत्तान्त

C. मगाजी 3- सामान्य इतिहास के ग्रंथ

D. मनाकिन 4- हजरत मुहम्मद के जीवन वृत्तान्त

कूटः

     A  B  C  D

(a) 1  3  2  4

(b) 3  4  1   2

(c)  1  2  3  4

(d) 3  4   2  1

उत्तर: (d)

 

जियारत/हकीकत/बका

इस्लाम धर्म में उदार, रहस्यवादी एवं संश्लेषणात्मक प्रवृत्तियों को निष्पादित करने वाली विचारधारा को सफ़ूीवाद कहा गया है। इसी क्रम में सफ़ूी संतों की दरगाह पर की जाने वाली धर्मयात्रा  को जियारत कहा जाता था। मुहम्मद-बिन-तुगलक ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की जियारत करने वाला पहला सुल्तान था।  

सफ़ूी मत के अनुसार, जब सालिक (साधक) को सात्विक ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है, तो वह अवस्था ‘हकीकत’कहलाती है। सफ़ूीवाद के अंतर्गत मोक्ष प्राप्त करने की अंतिम अवस्था ‘बका’ कहलाती है। इसमें साधक एवं ईश्वर के मध्य तादात्म्य स्थापित हो जाता है अर्थात् ईश्वर में जीवन की खोज ही बका है।

 

संभावित प्रश्न  

Q. सफ़ूीवाद के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से सही सुमेलित हैं/हैं?

1- जियारत - सफ़ूी संतों की दरगाह की धर्मयात्र।

2- हकीकत - सफ़ूी आचरण संहिता

3- बका - सफ़ूी खानकाह में होने वाला नृत्य

कूटः-

(a) केवल 1 (b) 2 और 3 (c) केवल 3  (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)

 

मलफ़ुजात/मक्तुबात/तजकिरा

मध्यकालीन भारत में सफ़ूी साहित्य के अंतर्गत मलफ़ुजात उन ग्रंथों को कहते थे, जिनमें सफ़ूी संतों के वार्तालापों अर्थात् कथनी और करनी को शामिल किया जाता था। प्रारंभिक मलफ़ुजात फ़वायद-उल-फ़वाद है जिसके लेखक अमीर हसन सिजजी देहलवी थे। इसी क्रम में सफ़ूी संतों द्वारा अपने अनुयायियों एवं सहयोगियों को लिखे गए पत्रों का संकलन मक्तुबात कहलाता है। जैसे- मक्तुबात-ए-रब्बानी, जो नक्शबंदी शेख अहमद सरहिन्दी के पत्रों का संकलन है। तजकिरा के अंतर्गत सफ़ूी संतों की जीवनियों को संकलित किया गया है। पहला सफ़ूी तजकिरा मीर खुर्द किरमानी द्वारा लिखित सिखार-उल-औलिया है।  

 

संभावित प्रश्न  

 

Q.: निम्नलिखित में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

1- मलफ़ुजात - भूमि पैमाइश की पद्धति

2- मक्तुबात - शाही घर-परिवार का विवरण

3- तजकिरा - सफ़ूी संतों की जीवनियाँ

कूटः

(a) 2 और 3 (b) केवल 3 (c) 1 और 2  (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

 

 

बा-शरा/बे-शरा/मसन्द

मध्यकाल में सफ़ूीवाद के अंतर्गत सफ़ूी सिलसिलों को दो वर्गों में विभाजित किया गया - 1- बा-शरा, 2. बे-शरा। वस्तुत बा-शरा के अंतर्गत उन सफ़ूी सिलसिलों को शामिल किया गया जो शरीयत की प्रधानता को स्वीकार करते थे। जैसे- वुजूदिया एवं शुहूदिया आदि। जबकि बे-शरा के अंतर्गत शामिल सफ़ूी सिलसिले, शरीयत की प्रधानता को स्वीकार नहीं करते थे। जैसे-मलंग, कलन्दर, हैदरी आदि।

इसके अलावा, ‘मसन्द’सिख धर्म से संबंधित गुरु के प्रतिनिधि होते थे। वे गुरू के लिए सिखों की आय का दसवाँ भाग वसूलते थे।

 

संभावित प्रश्न  

Q. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- सफ़ूी सिलसिलों में बा-शरा वर्ग, शरीयत की प्रधानता को स्वीकार नहीं करते थे।

2- मसन्द, सफ़ूी संतों के प्रिय शिष्य को कहते थे।

3- बे-शरा, सफ़ूी संतों को अनुदान में प्राप्त भूमि होती थी।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सत्य नहीं है/हैं?

(a) केवल 1 (b) केवल 2 और 3 (c) केवल 1 और 2  (d) 1, 2 और 3  

उत्तर: (d)

 

सभानायक/कर्णिक रायसम /सेनबोर/नियोग

विजयनगर साम्राज्य के केन्द्रीय प्रशासन के अंतर्गत राजा या राय को परामर्श देने हेतु एक केन्द्रीय मंत्रिपरिषद् होती थी जिसके अधिकारी महाप्रधानी या प्रधानी कहलाते थे एवं इसका अध्यक्ष सभानायक कहलाता था। इसके साथ ही केन्द्र में एक सचिवालय भी स्थापित किया गया था जिसका प्रमुख कर्णिक रायसम कहलाता था। इसके अलावा, लिपिकीय कार्य करने वाला अधिकारी सेनबोर कहलाता था तथा विभागों के लिए ‘नियोग’शब्द का प्रयोग किया जाता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: निम्नलिखित को सुमेलित कीजिए-  

 सूची -I   सूची-II

A. सभानायक 1. सचिवालय का प्रधाान

B. कर्णिक रायसम  2. लिपिक

C. सेनबोर 3. केन्द्रीय मंत्रिपरिषद् का प्रमुख

D. नियोग  4. विभाग

कूटः

 A B C D

(a) 2 4 1 3

(b)  1 2 3 4

(c) 3 2 1 4    

(d) 3 1 2 4

उत्तर: (d)

 

नायंकार या पोलिगर व्यवस्था

विजयनगर साम्राज्य की विशिष्ट व्यवस्था नायंकार व्यवस्था थी। पुर्तगाली लेखक नूनिज एवं पायस के अनुसार नायक वस्तुतः बड़े-बड़े  सामंत होते थे। इस व्यवस्था के तहत अमरनायक उस सैन्य अधिकारी को कहा जाता था जिसके अधीन निश्चित संख्या में सैन्य टुकड़ियाँ रहती थीं। इन नायकों को भूमि या क्षेत्र में राजस्व अधिकार प्राप्त थे, जो अमरम् कहलाते थे। विजयनगर में कुल भूमि का 3/4 भाग इसके तहत आता था। विजयनगर के शासकों द्वारा यह व्यवस्था सामुद्रिक व्यापार तथा अश्व व्यापार पर प्रभावी नियंत्रण के लिए स्थापित की गई थी।

 

संभावित प्रश्न  

Q. किसके राज्य में ‘नायंकार व्यवस्था’ की स्थापना प्रशासनिक व्यवस्था का एक विशिष्ट अभिलक्षण था?

(a) चोल               (b) पल्लव  

(c) विजयनगर      (d) चालुक्य

उत्तर: (c)

 

आयंगार व्यवस्था

विजयनगर साम्राज्य के दौरान आयंगार व्यवस्था ग्रामीण प्रशासन से संबंधित व्यवस्था थी। दरअसल, अब चोलों द्वारा स्थापित स्थानीय स्वायत्त शासन की परंपरा कमजोर पड़ गई एवं वास्तविक शक्ति 12 क्षेत्रीय अधिाकारियों के हाथों में चली गई। इन अधिकारियों का पद वंशानुगत होता था तथा इनके पदों की खरीद-बिक्री भी की जाती थी। इस पूरी पद्धति को आयंगार पद्धति कहा गया। इसके अंतर्गत नियुक्त अधिाकारियों को केन्द्र से वेतन के रूप में मान्या भूमि प्राप्त होती थी। इन ग्रामीण अधिकारियों की जानकारी के बिना सम्पत्ति स्थानांतरण, भू-दान, भूमि का क्रय-विक्रय आदि नहीं किया जा सकता था। ये अधिकारी अपने क्षेत्र में कानून व्यवस्था एवं शांति बनाए रखते थे। इनमें सेनतेओबा - गाँव की आय-व्यय का हिसाब रखने वाला, टलस - गाँव का चौकीदार आदि शामिल थे। राजा, महानायकाचार्य नामक अधिकारी के माध्यम से इन अधिकारियों से संपर्क रखता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: ग्रामीण प्रशासन की आयंगार पद्धति किस राज्य द्वारा प्रारंभ की गई थी?

(a) चोल  (b) विजयनगर (c) चालुक्य (d) बहमनी

उत्तर: (b)

 

अथावना/सिस्ट/कुदि/कुट्टगि

विजयनगर साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था के अंतर्गत राजस्व विभाग को अथावना कहा जाता था। यह विभाग सिस्ट नामक भूमि-कर की वसूली करता था जो विजयनगर राज्य की आय का प्रमुख स्त्रोत था। कर निर्धारण माप-जोख के आधार पर होता था। समस्त भूमि पर राजा का अधिकार होता था। विजयनगर में कृषक मजदूर कुदि कहलाते थे। भूमि की खरीद-बिक्री के साथ इससे संबद्ध कुदि भी हस्तांतरित हो जाते थे। राज्य द्वारा पट्टे पर दी गई भूमि कुट्टगि कहलाती थी।

संभावित प्रश्न  

Q. निम्नलिखित में से कौन-सा सही सुमेलित है/हैं?

1- अथावना  - राजस्व विभाग

2- सिस्ट  - भूमि कर

3- कुदि  - कृषक मजदूर

4- कुट्टगि  - पट्टे पर प्रदत्त भूमि

कूटः  

(a) 1 और 2  (b) 2, 3 और 4 (c) 1, 3 और 4 (d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (d)

 

भण्डारवाद/रक्त कोडगे/मान्या

विजयनगर साम्राज्य के अंतर्गत केन्द्र के प्रत्यक्ष नियंत्रण में रहने वाली भूमि भण्डारवाद कहलाती थी। यह उत्तर भारत की खालिसा भूमि के समान थी। युद्ध स्थल में वीरता का प्रदर्शन करने वाले सैनिकों या शहीद सैनिकों के परिवारों को दी जाने भूमि रक्त कोडगे कहलाती थी। साथ ही आयंगारों को प्रदान की जाने वाली कर मुक्त भूमि को मान्या भूमि कहा जाता था। इसके अलावा कुछ विशेष सैनिक सेवाओं के बदले दी जाने वाली कर मुक्त भूमि ‘उम्बलि’ कहलाती थी।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: निम्नलिखित में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित नहीं है/हैं?

1- भण्डारवाद  - राजकीय कोषागार

2- रक्त कोडगे  - युद्ध बंदी

3- मान्या  - आयंगारों को प्रदत्त कर मुक्त भूमि

कूटः

(a) 1, 2 और 3  (b) 1 और 2  

(c) केवल 3   (d) 2 और 3

उत्तर: (b)

 

दसावन्दा/कंदाचार

विजयनगर साम्राज्य के अंतर्गत प्रशासन में सिंचाई से संबंधित कोई विभाग नहीं बनाया गया था, बल्कि सिंचाई की व्यवस्था सामुदायिक तौर पर की जाती थी। साथ ही सिंचाई में पूँजी निवेश कर आय प्राप्त की जाती थी। इसे ही तमिल क्षेत्र में दसावन्दा एवं कर्नाटक में कडकोडेज कहा जाता था।

इसके अलावा, विजयनगर साम्राज्य में सेना के लिए ‘कंदाचार’ शब्द का प्रयोग किया जाता था। महासेनापति या नायक सैन्य विभाग का महाप्रबंधक था। राज्य में सैनिकों के प्रशिक्षण हेतु विद्यालयों की स्थापना की गई थी।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: मध्यकालीन भारतीय इतिहास में ‘दसावन्दा’ एवं ‘कंदाचार’ शब्द किस साम्राज्य/वंश में प्रयुक्त किए जाते थे?

(a) बहमनी (b) विजयनगर (c) तुगलक  (d) मुगल

उत्तर: (b)

 

समयाचार्य/ शास्त्रिता /प्रतिष्ठा/कवलकार

विजयनगर साम्राज्य के अंतर्गत स्थापित न्याय व्यवस्था में न्यायाधीश को समयाचार्य कहा जाता था। याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर संहिता एवं माधव कृत टीका को न्याय का आधार माना जाता था तथा न्यायालय की भाषा संस्कृत थी। राज्य में न्यायालयों का पदसोपानिक क्रम होता था। राजा का न्यायालय ‘शास्त्रिता’ कहलाता था तथा केन्द्र द्वारा नियुक्त न्यायालय को ‘मुद्रिता’, सर्किल कोर्ट को ‘चल’ एवं ग्रामीण न्यायालय को ‘प्रतिष्ठा’ कहा जाता था। साथ ही ग्राम पंचायतें, जाति पंचायतें एवं श्रेणी संगठन भी होते थे। प्रान्तपति एवं नायक अपने-अपने क्षेत्र में न्याय कार्य संपादित करते थे।

इसके अलावा, राज्य में सुव्यवस्थित पुलिस प्रणाली भी स्थापित की गई थी। पुलिस विभाग को ‘कवलकार’ कहा जाता था।

 

संभावित प्रश्न  

 Q.: विजयनगर साम्राज्य के संदर्भ में निम्नलिखित को सुमेलित कीजिए-

A. समयाचार्य 1- पुलिस विभाग

B. शास्त्रिता 2- राजा का न्यायालय

C. प्रतिष्ठा 3- न्यायाधीश

D. कवलकार 4- ग्रामीण न्यायालय

कूटः

 A B C D

(a) 1 2 3 4

(b)  3 4 1 2

(c) 2 1 4 3    

(d) 3 2 4 1

उत्तर: (d)

 

वराह/प्रताप/फ़णम

विजयनगर साम्राज्य की अर्थव्यवस्था के अंतर्गत वराह, प्रताप एवं फ़णम, राज्य में प्रचलित सोने के सिक्के थे। इनमें से वराह (52 ग्रेन) सर्वाधिक प्रसिद्ध स्वर्ण सिक्का था। इसे राष्ट्रीय सिक्के की मान्यता प्राप्त थी। इसके अन्य नाम हूण, पोन एवं परदास (पगोडा) भी थे।

इसके बाद प्रताप एवं फ़णम स्वर्ण सिक्के आते थे। प्रताप, वराह का आधा एवं फ़णम, वराह के दसवें हिस्से के बराबर होता था।

इसके अलावा, राज्य में तार एवं धौरहरे नामक चाँदी के सिक्के एवं जीतल नामक ताँबे के सिक्के भी प्रचलित थे।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: विजयनगर कालीन इतिहास के संदर्भ में ‘वराह’ एवं ‘प्रताप’ क्या/कौन थे?

(a) राजा के शाही अंगरक्षक  (b) आयात-निर्यात कर

(c) स्वर्ण सिक्के     (d) भू-राजस्व अधिकारी

उत्तर: (c)

 

वीरपंचाल/बड़वा/बेसबग

विजयनगर साम्राज्य की सामाजिक संरचना के अंतर्गत ब्राह्मण जाति सर्वश्रेष्ठ जाति थी। क्षत्रियों के विषय में जानकारी नहीं मिलती है। मध्य वर्गों में शेट्टी या चेट्टी नामक बड़े समूह का उल्लेख मिलता है। चेट्टियों के ही समतुल्य व्यापार करने वाले तथा दस्तकार वर्ग के लोग थे, उन्हें ‘वीरपंचाल’ कहा जाता था। इसके अतिरिक्त ‘विप्राविनोदिन’ नामक जातीय श्रेणी थी। इसमें लोहार, स्वर्णकार तथा दस्तकार शामिल थे।

इस काल में उत्तर भारत के बहुत सारे लोग दक्षिण भारत में बस गए थे, उन्हें ‘बड़वा’ कहा जाता था। इसके साथ ही विजयनगर में दास प्रथा प्रचलित थी और दासों की खरीद-बिक्री को ‘बेसबग’ कहा जाता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: विजयनगर साम्राज्य के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

1- वीरपंचाल - युद्ध में शहीद सैनिक

2- बड़वा - ग्राम सभा का मुखिया

3- बेसबग - दासों का क्रय-विक्रय

कूटः

(a) केवल 2 (b) 1 और 3 (c) केवल 3  (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)

 

कवलकरस/पदिकावल/अरसुस्वतं

विजयनगर साम्राज्य की प्रशासनिक संरचना के अंतर्गत राजमहल की सुरक्षा से संबंधित अधिकारी ‘कवलकरस’ कहलाता था।  वह नायकों के अंतर्गत कार्य करता था। कभी-कभी पुलिस के अधिकारों को बेच दिया जाता था जिसे पदिकावल कहा जाता था।

पुलिस कर को अरसुस्वतंत्रम् कहा जाता था। इसके अलावा, स्थल दायम, मार्ग दायम और मनुला दायम नामक तीन मुख्य परिवहन शुल्क थे।

 

संभावित प्रश्न  

Q. विजयनगर साम्राज्य के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए-

1- कवलकरस - भू-राजस्व अधिकारी

2- पदिकावल - पैदल सैनिक

3- अरसुस्वतंत्रम् - पुलिस कर

उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/ से सही सुमेलित है/हैं?

(a) केवल 1  (b) केवल 3

(c) 2 और 3   (d) 1 और 2

उत्तर: (c)

 

जब्ती पद्धति/रय/जरीबाना

शेरशाह की भूमि माप की पद्धति जब्ती पद्धति कहलाती थी। इसे टोडरमल पद्धति के नाम से भी जाना जाता था। इसमें माप के लिए जरीब का प्रयोग किया गया जो सन के डण्डे या रस्सी का बना होता था। माप की सबसे छोटी इकाई बीघा एवं सबसे बड़ी इकाई परगना होती थी।

शेरशाह ने अनाजों की दर की एक तालिका तैयार करवायी जिसे ‘रय’ कहा जाता था। दर निर्धारण के लिए आस-पास के क्षेत्रों के मूल्य को आधार बनाया जाता था। इसके अलावा, भूमि माप के अधिकारी एवं भू-राजस्व वसूली करने वाले अधिकारी को वेतन देने के लिए क्रमशः जरीबाना एवं मुहसिलाना नामक कर भी लगाया गया। जरीबाना उत्पादन का 2.5 प्रतिशत तथा मुहसिलाना उत्पादन का 5 प्रतिशत होता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: शेरशाह सूरी के प्रशासन के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

1- जब्ती पद्धति  - पराजित राज्य पर आरोपित कर प्रणाली

2- रय - परगना का प्रमुख

3- जरीबाना  - भू-राजस्व वसूली अधिाकारी का वेतन

कूटः

(a) केवल 3 (b) केवल 2 (c) 1 और 3  (d) 2 और 3

उत्तर: (a)

 

डेल एवं मौजा

शेरशाह सूरी की प्रशासनिक संरचना के अंतर्गत प्रशासन की सबसे छोटी इकाई डेल या मौजा थी जो गाँव का ही रूप था। वैसे गाँव डेल कहलाते थे जिसमें कृषि की भूमि के साथ निवासयोग्य भूमि भी होती थी जबकि मौजा वैसे गाँव को कहा जाता था जिसमें केवल कृषि की भूमि होती थी। इसका प्रधान मुखिया या पटवारी कहलाता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: शेरशाहकालीन प्रशासन के अंतर्गत ‘डेल’ एवं ‘मौजा’ क्या थे/थीं?

(a) भूमि पैमाइश की पद्धतियाँ (b) गाँव के प्रकार

(c) स्थानीय जमींदार    (d) सार्वजनिक जलाशय

उत्तर: (b)

 

स्वराज एवं मुघतई

शिवाजी का प्रशासन मूलतः दक्कनी व्यवस्था पर आधारित था, परंतु इसमें कुछ मुगल तत्व भी शामिल थे। ये मराठा राज्य के अंतर्गत दो प्रकार के क्षेत्र होते थे।

1- स्वराजः जो क्षेत्र प्रत्यक्षतः मराठों के नियंत्रण में थे, उन्हें स्वराज क्षेत्र कहा जाता था।

2- मुघतई या मुल्कत-ए-कदीमः यह वह क्षेत्र था जिसमें मराठा सरदार चौथ एवं सरदेशमुखी वसूल करते थे।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: शिवाजी के प्रशासन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- मराठों के प्रत्यक्ष नियं=ण में रहने वाला क्षे= स्वराज कहलाता था।

2-  मुघतई क्षे= में मुगलों का प्रत्यक्ष नियं=ण होता था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन - सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1   (b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों     (d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (a)

 

अमात्य/सुरनविस/वाकयानविस

शिवाजी द्वारा स्थापित प्रशासनिक संरचना के अंतर्गत छत्रपति की सहायता हेतु केन्द्र में आठ मंत्रियों की परिषद् होती थी जिसे अष्टप्रधान कहते थे। इन आठ मंत्रियों में अमात्य या मजूमदार वित्त मंत्री होता था जो सभी आर्थिक मामलों का प्रमुख होता था। सुरनविस या सचिव, पत्राचार विभाग की देखरेख करता था। साथ ही यह महलों एवं परगनों के हिसाब की जाँच भी करता था। वाकयानविस या मंत्री, दरबारी कार्यों का रिकॉर्ड रखता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: शिवाजी के प्रशासनिक संरचना के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों में कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

1- अमात्य - आर्थिक विभाग का प्रमुख

2- सुरनविस  - विदेश विभाग का प्रमुख

3- वाकयानविस  - सैन्य विभाग का प्रमुख

कूटः

(a) 1 और 2 (b) 2 और 3

(c) केवल 1  (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)

 

सर-ए-नौबत/सुमन्त/पण्डितराव

शिवाजी की प्रशासनिक संरचना के अंतर्गत स्थापित अष्ट प्रधानों में से सर-ए-नौबत, सेना का नेतृत्व करता था। सुमन्त या दबीर, विदेश विभाग की देखभाल करता था। पण्डितराव या दानाध्यक्ष का कार्य धार्मिक मामलों में छत्रपति को परामर्श देना होता था। न्यायाधीश, न्याय विभाग का प्रमुख होता था। इनमें से पेशवा, सुरनविस एवं सुमंत प्रांतीय प्रशासन से भी जुड़े हुए थे।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: शिवाजी के प्रशासन के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित नहीं है/हैं?

 अधिकारी  कार्य

1- सर-ए-नौबत - सेना का नेतृत्व

2- सुमंत - पत्राचार विभाग का प्रमुख

3- पण्डितराव - धार्मिक परामर्शदाता

कूटः

(a) 1 और 3  (b) केवल 2  

(c) 2 और 3   (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

 

 

तौहीद-ए-इलाही या दीन-ए-इलाही

1582 ई. में काबुल अभियान से लौटने के बाद अकबर ने ‘दीन-ए-इलाही’ नामक नए धर्म का प्रतिपादन किया जिसमें सभी धर्मों के मूल तत्वों का समावेश किया गया। इसके सदस्य को इलाही कहा जाता था। अबुल फ़जल ने इसके 12 प्रमुख सिद्धांतों की व्याख्या की है जिससे अबुल फ़जल इस धर्म के मुख्य पुरोहित कहलाए। इसमें कुल 19 प्रतिष्ठित सदस्य शामिल थे। बीरबल इसके एकमात्र हिंदू सदस्य थे। इसके प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं-

• इसके सदस्यों को जन्मदिन एवं जीवित अवस्था में ही मृत्यु भोज देना होता था।

• एक पत्नी व्रत का पालन करना। कम उम्र की लड़कियों एवं अधिक उम्र की महिलाओं से विवाह न करना।

• विधवा विवाह को प्रोत्साहन देना।

• बादशाह के सम्मुख सिजदा एवं जमीनबोस  करना।

• शाकाहार का सेवन करना।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: ‘दीन-ए-इलाही’ के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- इसका प्रतिपादन अकबर द्वारा किया गया।

2- बीरबल के अतिरिक्त राजा मानसिंह भी इसके हिंदू सदस्य थे।

3- अबुल फ़जल ने इसके 12 प्रमुख सिद्धांतों की व्याख्या की है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) 1 और 2   (b) केवल 1  

(c) 1 और 3    (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)

 

 

इबादतखाना

इबादतखाना की स्थापना 1575 ई. में अकबर द्वारा फ़तेहपुर सीकरी में की गई जोकि एक पूजा गृह था। आगे 1578 ई. में अकबर ने सभी धर्मों के साथ मेल-मिलाप के उद्देश्य से इसके द्वार सभी धर्मावलम्बियों के लिए खोल दिए। इसमें अकबर विभिन्न धर्मों के विद्वानों के साथ चर्चा करता था। धार्मिक चर्चा प्रत्येक बृहस्पतिवार को की जाती थी। इसमें विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधिायों में अब्दुल्ला सुल्तानपुरी एवं अब्दुन्नवी ने रूढ़िवादी मुसलमानों का तथा शेख मुबारक व उसके दोनों पुत्रों ने उदार मुसलमानों का प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा, हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व पुरुषोत्तम एवं देवी पंडित द्वारा, पारसी धर्म का दस्तूर मेहरजी राणा द्वारा, जैन धार्म का हीरविजय सूरी द्वारा तथा ईसाई धर्म का रुडोल्फ़ एक्वाविवा, एन्टोनी मॉन्सरेट तथा फ्रांसिस एनरिक्वेज द्वारा प्रतिनिधित्व किया गया था। ध्यातव्य है कि इन धार्मिक चर्चाओं में किसी बौद्ध भिक्षु ने भाग नहीं लिया था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: अकबर द्वारा स्थापित इबादतखाना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- यह आगरा में स्थित राज परिवार के प्रयोग हेतु एक मस्जिद थी।

2- इसमें विभिन्न धर्मों के विद्वानों के साथ अकबर द्वारा धार्मिक चर्चा की जाती थी।

3- इसमें किसी बौद्ध भिक्षु ने भाग नहीं लिया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही नहीं है/हैं?

(a) 2 और 3   (b) केवल 1  

(c) 1 और 2   (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

 

महज़र

मुगलकाल में महज़र 7 प्रमुख उलेमाओं द्वारा हस्ताक्षर किया गया एक घोषणा-पत्र था। इसे अकबर द्वारा 1579 ई. में तैयार करवाया गया था। इसका प्रारूप शेख मुबारक ने तैयार किया था। इसमें कहा गया था कि उलेमाओं में किसी बात पर मतभेद की स्थिति उत्पन्न होने पर अकबर किसी एक विचार को स्वीकार करने में स्वतंत्र होगा एवं उलेमाओं के विचारों से असंतुष्ट होने पर वह नया कानून बना सकेगा। साथ ही कुरान से सुसंगत एवं राज्य के हित में अकबर द्वारा निर्मित कानून का पालन सभी के लिए अनिवार्य होगा। इसमें अकबर को अमीर-उल-मोमीन एवं ईमान-ए-आदिल कहा गया था। फ़ैजी एवं अबुल फ़जल द्वारा इस पर हस्ताक्षर नहीं किया गया था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: मुगलकालीन इतिहास में ‘महज़र’क्या था?

(a) बाल विवाह रोकने हेतु निर्मित कानून

(b) भू-राजस्व संबंधी कर

(c) शाही परिवार द्वारा दिया गया अनुदान

 (d) सर्वोच्चता का निर्णय संबंधी घोषणा-पत्र

उत्तर: (d)

 

सिद्दी/अंगरिया/अगाऊ

मुगलकाल के दौरान सिद्दी पश्चिमी तट पर मुगलों के प्रतिनिधि थे। शिवाजी को सिद्दियों के विरुद्ध कभी सफ़लता नहीं मिली। 1715 ई. में शाहू के काल में कान्होजी आंग्रे ने मराठा नौसेना की तरफ़ से सिद्दियों को हराया।

कोलाबा के अंगरिया पश्चिमी तट पर मराठा नौसेना के संरक्षक थे।

अगाऊ एक प्रकार का ऋण था जिसे मराठा राज्य की ओर से किसानों को बीज व मवेशियों को खरीदने के लिए दिया जाता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: निम्नलिखित युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

1- सिद्दी - पश्चिमी तट पर मुगलों के प्रतिनिधि  

2- अंगरिया - शिवाजी के शाही अंगरक्षक

3- अगाऊ - मराठों द्वारा किसानों पर आरोपित कर।

कूटः

(a) 1 और 3   (b) केवल 1

(c) 2 और 3       (d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

 

वकील-ए-मुतलक/दीवान-ए-अशरफ़/मीरबख्शी

मुगलकालीन प्रशासन के अंतर्गत केंद्रीय मंत्रिपरिषद् का प्रमुख वकील-ए-मुतलक (प्रधानमंत्री) कहलाता था। इसमें वकील एवं दीवान दोनों के अधिकार सम्मिलित थे।

दीवान-ए-अशरफ़, राजस्व विभाग का प्रमुख होता था। इसके अलावा मुगलकाल में सैन्य विभाग का प्रमुख मीरबख्शी कहलाता था। इसे अफ़सर-ए-खजाना भी कहा जाता था। अभियानों में सैन्य व्यवस्था हेतु एक बख्शी होता था जो बख्शी-ए-लश्कर कहलाता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: निम्नलिखित युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

1- वकील-ए-मुतलक  - न्याय विभाग का प्रमुख

2- दीवान-ए-अशरफ़  - शाही अंगरक्षकों का प्रमुख

3- मीरबख्शी  - सैन्य विभाग का प्रमुख

कूटः

(a) 1 और 3 (b) केवल 1 (c) 2 और 3    (d) केवल 3

उत्तर: (d)

 

मीर-ए-समाँ/मुफ्ती/सद्र-उस-सुद्र

मुगलकाल में मीर-ए-समाँ पद का सृजन किया गया। यह शाही घराने की आवश्यकताओं का प्रबंध करता था, साथ ही शाही कारखानों का प्रमुख था। इसके अन्य कार्य दरबारी शिष्टाचार का पालन कराना, शाही अंगरक्षकों पर नियंत्रण आदि थे।

न्याय विभाग का प्रमुख काज़ी होता था। काज़ी की सहायता हेतु कानूनों की व्याख्या करने लिए मुफ्ती या वकील-ए-शरह नामक अधिकारी की नियुक्ति की जाती थी।

सद्र-उस-सुद्र नामक अधिकारी धार्मिक विभाग का प्रमुख था जो शिक्षा पर नियंत्रण व निरीक्षण, काजि़यों एवं मुफ्तियों की नियुक्ति, मदद्-ए-माश भूमि का वितरण आदि दायित्वों को निभाता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.; मुगलकालीन प्रशासन के संदर्भ में निम्नलिखित युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित नहीं है/हैं?

1- मीर-ए-समाँ - शाही कारखानों का प्रमुख

2- मुफ्ती  -  न्याय विभाग का प्रमुख

3- सद्र-ए-सुद्र -  धार्मिक विभाग का प्रमुख

कूटः

(a) 1 और 3 (b) केवल 2 (c) केवल  3     (d) 1, 2 केवल 3

उत्तर: (b)

 

साहबे तौजीह/कुरबेगी/अवरजाहनवीस

मुगलकालीन प्रशासनिक अधिकारियों में साहबे तौजीह का कार्य वेतन का वितरण करना होता था। हालांकि यह केवल राजधानी से संबंधित सेवकों के वेतन तक ही सीमित था।

मुगल साम्राज्य की शाही पताकाओं की देखभाल करने वाला अधिकारी कुरबेगी कहलाता था। साथ ही दरबार के दैनिक खर्च का लेखा-जोखा रखने वाला अधिकारी अवरजाहनवीस कहलाता था।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: मुगलकालीन प्रशासन के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

1- साहबे तौजीह - वेतन वितरणकर्त्ता  

2- कुरबेगी  -  वन अधीक्षक

3- अवरजाहनवीस -  सम्राट का मुख्य सचिव

कूटः

(a) 1 और 3 (b) केवल 1 (c) 2 और 3     (d) 1, 2 केवल 3

उत्तर: (b)

 

तैनात-ए-रकाब/तैनात-ए-सुबाजात/अख्तबेगी

मुगल साम्राज्य में 1000 या उससे अधिक के मनसबदार को अमीर या उमरा वर्ग कहते थे। इनकी दो श्रेणियाँ थीं- प्रथम, जो मनसबदार राजदरबार में नियुक्त होते थे उन्हें तैनात-ए-रकाब कहते थे तथा द्वितीय, प्रांतों में नियुक्त होने वाले मनसबदार तैनात-ए-सुबाजात कहलाते थे। इसके अलावा, मुगल काल में शाही घुड़शाल के निरीक्षक को अख्तबेगी कहते थे।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: मुगलकालीन प्रशासन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- राजदरबार में नियुक्त होने वाले उमरा वर्ग को तैनात-ए-सुबाजात कहा जाता था।

2- प्रांतों में नियुक्त होने वाले उमरा वर्ग को तैनात-ए-रकाब कहा जाता था।

3- शाही घुड़शाल का दरोगा अख्तबेगी कहलाता था।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

(a) 1 और 2 (b) 1 और 3 (c) केवल 3     (d) 1, 2 केवल 3

उत्तर: (c)

 

मुसादात/सिपहसालार/फ़रमान-ए-सबाती

मुगल काल के दौरान अकबर द्वारा अमीरों को राज्य की तरफ़ से ऋण प्रदान करने की व्यवस्था को ‘मुसादात’ कहा जाता था।

मुगल काल में अकबर द्वारा प्रांतीय प्रशासन का मानक ढाँचा विकसित किया गया। उसने अपने साम्राज्य को प्रारंभ में 12 प्रांतों या सूबों में बाँटा। इसका प्रधान सूबेदार, नाजिम या सिपहसालार कहलाता था। सूबेदार की नियुक्ति बादशाह द्वारा जारी आदेश के माध्यम से की जाती थी जिसे ‘फ़रमान-ए-सबाती’ कहते थे।

 

संभावित प्रश्न  

Q.: मुगलकाल के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए-

1- अकबर द्वारा अमीरों को राज्य की तरफ़ से ऋण प्रदान करने की व्यवस्था की गई, जिसे तकावी कहा गया।

2- बादशाह का निजी सचिव सिपहसालार कहलाता था।

3- प्रांतों में दीवान की नियुक्ति का आदेश फ़रमान-ए-सबाती कहलाता था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही नहीं है/हैं?

(a) 1, 2 और 3   (b) 2 और 3    (c) 1 और 3    (d) केवल 1

उत्तर: (c)