Aug. 18, 2022

अरबिंदो घोष

चर्चा में क्यों ?

 

  • हाल ही में, 15 अगस्त को अरबिंदो घोष की 150वीं जयंती मनाई गई
  • साथ ही इनकी 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में  केंद्र सरकार ने 12 अगस्त से 15 अगस्त, 2022 तक भारत की 75 जेलों में आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किया| इस कार्यक्रम के माध्यम से अरबिंदो घोष के दर्शन को आत्मसात करते हुए कैदियों के जीवन को बदलने में सहायता की जाएगी

मुख्य बिंदु   

  • संस्कृति मंत्रालय द्वारा भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में उनकी सहभागिता पर विचार करते हुए , भारत में 75 जेलों को चिह्नित किया गया।
  • इन जेलों में बंद कैदियीं को अरबिंदो घोष का दर्शन सिखाकर तथा योग एवं ध्यान के अभ्यास के माध्यम से उनके जीवन में परिवर्तन लाने के उद्देश्य से कार्यक्रम आयोजित किये गए।
  • संस्कृति मंत्रालय ने आध्यात्मिक नेताओं तथा संगठनों के सहयोग से  इस कार्यक्रम का आयोजन किया।

 

इसके तहत 23 राज्यों में कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें निम्नलिखित संगठन शामिल रहे- 

  • पतंजलि                           
  • ईशा फाउंडेशन 
  • सत्संग फाउंडेशन           
  • आर्ट ऑफ लिविंग 
  • रामकृष्ण मिशन

अरबिंदो घोष के बारे में 

  • इन्हें लोकप्रिय रूप से ‘योगी ऋषि अरबिंदो’ के रूप में जाना जाता है| वह एक क्रांतिकारी, राष्ट्रवादी, कवि, शिक्षाविद और दार्शनिक थे।
  • इनका जन्म 15 अगस्त,1872 को हुआ था| 7 वर्ष की आयु में उन्हें शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया गया|
  • 5 दिसंबर, 1950 को उनकी मृत्यु हुई थी।

योगदान

  • 1893 में भारत लौटने पर वह राजकीय सेवा में अधिकारी के रूप में नियुक्त हुए।
  • उन्होंने बड़ौदा कॉलेज में प्रोफेसर के रूप में भी काम किया।
  • वह एक क्रांतिकारी संगठन में भी शामिल हुए और भारत में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह की गुप्त तैयारी में अग्रणी भूमिका निभाई।
  • उन्होंने लॉर्ड कर्ज़न द्वारा किए गए बंगाल विभाजन के विरुद्ध प्रारंभ स्वदेशी आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया।
  • इनके क्रांतिकारी विचारों से क्रोधित होकर ब्रिटिश सरकार ने 1908 ई. में इन्हें अलीपुर षड्यंत्र मामले में गिरफ्तार कर लिया| अलीपुर जेल में उन्हें हिन्दू धर्म एवं हिन्दू-राष्ट्र विषयक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति हुई।   
  • वह भारत के पहले राजनीतिक नेता थे जिन्होंने अपने समाचार-पत्र ‘बंदे मातरम’ में देश के लिए पूर्ण स्वतंत्रता के विचार को खुलकर सामने रखा।
  • वह 1930 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की घोषणा से 20 साल पहले 'पूर्ण स्वराज' के पहले प्रस्तावक थे।

साहित्यिक कार्य

  • वह एक पत्रकार भी थे और उनकी पहली दार्शनिक पत्रिका ‘आर्य’ नाम से 1914 में प्रकाशित हुई थी।
  • इसके अलावा , उन्होंने ‘द लाइफ डिवाइन’, ‘द सिंथेसिस ऑफ योगा’ और ‘सावित्री’ आदि कई कृतियों की रचना की।